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Sunday, August 2, 2009

सच के साईड इफेक्ट्स

पिछले कुछ दिनों से न्यूज़ चैनल "सच का सामना"रियलिटी शो को बंद करवाने के लिए मचे बवाल के न्यूज़ से भरा रहा...आखिरकार इसे जारी रखने की मान्यता मिल ही गई.....सोचने की बात तो ये है कि क्या ये इतना बड़ा मुद्दा था...जिसे मंत्रालय में उठाया गया...?.....देखा जाए तो इससे भी कहीं अधिक गंभीर मुद्दों पर तो आज तक नजर भी नही डाली गई है...सूर्य ग्रहण के दिन विकलांग बच्चों को जमीन में गाड़ा गया....सरेआम एक महिला के साथ छेड़छाड़ हुई....और भी ऐसे कई मामले तात्कालिक थे..जिन पर विचार ज्यादा जरूरी थे....बजाय एक रियलिटी शो में पूछे जाने वाले बोल्ड सवालों पर टिप्पणी के.....

आज सभी के हांथों में रिमोट होता है....और लाखों चेनलों की भीड़ में हर एक अपने मन मुताबिक शो देखता है....हर व्यक्ति अपने पसंद के सीरियल देखता है उसपर कोई दबाव नही है कि उसे क्या देखना है और क्या नही...ये उसकी अपनी पसंद होती है.....हो सकता है जो शो किसी को रत्ती भर पसंद न हो वह किसी और का पसंदीदा शो हो.....हमने ऐसे भी कई शो देखें हैं जो जनता के कम सपोर्ट कि वजह से एक-दो हफ्तों में ही नौ दो ग्यारह हो गए.......तो क्यूँ न ये फ़ैसला भी जनता का ही हो....अगर अधिकाँश जनता इसके विरुद्ध होगी तो ये वैसे ही बंद हो जायेगा....

इस शो को बंद करने का मुद्दा उठाते हुए ये कहा गया था कि इससे भारतीय सभ्यता बिगड़ रही है.....उन सभी को क्या ये बात नही दिखाई दे रही कि जो प्रतियोगी आ रहे है और भारतीय सभ्यता के विरुद्ध पूछे गए सवालों का जवाब हाँ में दे रहे हैं....वे तो पहले ऐसा कोई शो नही देखे थे बिगड़ने के लिए....या देख कर भी बिगडे हो तो भी उस वक्त तो हमारे देश में ऐसे शो नही थे.....अगर किसी को बिगड़ना है तो उसे आप रोक नही सकते...कम से कम दबा कर तो नही.....प्यार से काम जरूर हो सकता है....

एक सवाल ये भी उठाया गया की लोग पैसों की वजह से सच बोलने आ रहे हैं.....तो इसमे बुरा क्या है..?कोई सच बोलना चाहता है...फ़िर भले ही लालच में ही क्यूँ न बोले...?...मेरा भी मानना है कि कई बार प्रश्न ऐसे होते है कि उनके जवाब से व्यक्ति का जीवन बरबाद हो सकता है...लेकिन ये तो प्रतियोगी के ऊपर होता है..उस पर कोई दबाव नही होता..वो जब चाहे खेल छोड़ सकता है....इस बात में आप और हम सवाल क्यूँ उठाएं जब कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से कोई काम कर रहा है...

मेरा तो यही मानना है की समय के हिसाब से सभी को बदलना चाहिए...कोई भी सभ्यता इतनी कमजोर नही होती की उसे इतनी आसानी से बिगड़ना सम्भव हो...समलैंगिकता को भी मान्यता मिलने पर इसी तरह का बवाल उठा....उन्हें मान्यता हाल ही में मिली है...लेकिन वे तो बरसों से ऐसे ही जी रहे हैं...मान लीजिये की फ़िर से समलैंगिगता को गैर कानूनी करार दे भी दिया जाए तो क्या परिस्थिति सुधर जायेगी...?....ऐसा कुछ नही होगा....तो क्या ये सही नही है की जो जैसे जीना चाहता है उसे वैसे ही जीने दिया जाए...?समाज बदल रहा है..क्यूंकि लोग बदल रहे हैं....आज तो हमारी कई मान्यताएं भी बदलने लगीं हैं....इसमे बुराई भी क्या है?......जीवन में बदलाव जरूरी है.....ऐसा तो हर बार नही हो सकता न की जो आपको पसंद न हो उसे दुनिया भी पसंद न करे....कई बार तो ये विरोध आपको अपने घर में भी मिल सकता है.....इसलिए सच्चाई से साक्षात्कार करें....

राजा हरिश्चंद्र के इस भारत में सच बोलने पर इतने सवाल उठेंगे......सोचा ना था....