Friday, February 26, 2010

दुआ की कीमत

फरवरी की शुरुवात में ही हम अजमेर गए...वैसे हमारा १० दिनों का लम्बा प्लान था.....अजमेर पहुँचकर अपने भाई के दोस्त के घर पर फ्रेश हुए....फिर मशहूरअजमेर शरीफ (दरगाह) गए.....वहां ३ बजे पहुँचने पर पता चला कि अन्दर जाने के लिए ४ बजे तक का इंतजार करना होगा...सो हमने उस एक घंटे को आसपास की दुकाने देखने और छोटी देग और बड़ी देग देखने में बिताया....बाद में हम सभी ने मिलकर दरगाह में चादर चढ़ाई और दर्शन किये....यहाँ मुझे केवल एक ही बात खली....वो ये की यहाँ जो खुदा के खिदमतगार खड़े होते हैं...उन्हें वहां दर्शन के लिए आये लोगों से कदम-कदम पर पैसे मांगते हुए देखा जा सकता है....जिन्हें यदि मना किया जाये या टाला जाये...तो दो पल पहले दुआ देती उनकी जुबान लोगों को बददुआ देने में ज़रा भी देर नहीं करती.......और उनकी बददुआये उनकी दुआओं की तुलना में कुछ ज्यादा दिल से निकली लगती हैं.....

दरगाह के पास खड़े लोग आपकी श्रद्धा -भावना को चादर पर चढ़े रुपयों के हिसाब से तौलते हैं.....अगर आपको वे एक धागा भी हाँथ में बांधते हैं,तो उससे पहले वो आपसे पैसे मांगते हैं......यही हाल अजमेर के तारागढ़ की मज़ार का था....यहाँ तो अन्दर घुसने से पहले ही दरवाजे पर पैसे चढाने को कहा जाता है........अन्दर जाकर दर्शन करने पर भी पैसे की मांग ज़ारी रहती है.............

ऐसी किसी दरगाह या मज़ार पर जाकर इंसान कुछ पलों के लिए खुद को परमेश्वर के करीब महसूस करना चाहता है.......वो चाहता है कि कुछ पल अपने दुख-दर्द को भुलाकर शांति का अनुभव करे,लेकिन ऐसा करना अब कुछ मुश्किल सा होता जा रहा है.........ऐसे इंसान जिन्होंने शायद अपनी ज़िन्दगी में कभी पैसों को इतना महत्व नहीं दिया होगा और इसी वजह से शायद उन्हें इतना बड़ा ओहदा मिला...उनकी मजारें यहाँ बनी हुई हैं,जिन पर लाखों लोग आकर सजदा करते हैं...लेकिन आज इनकी मजारों को ही व्यवसाय का जरिया बनाया जा रहा है......इन्होने कभी ऐसा.....सोचा ना था....

Wednesday, January 13, 2010

अवतार


अवतार,ये शब्द हमारे जेहन में कई काल्पनिक चित्रों को एक साथ लाकर खड़ा करता है.....काल्पनिक इसलिए लिखा;क्यूंकि जब भी मैं अपने धार्मिक ग्रंथों में उल्लेखित अवतारों के बारे में सुनती या पढ़ती हूँ..तो मन में वास्तविकता और काल्पनिकता का एक द्वंद्व शुरू हो जाता है.........हम सभी कहीं न कहीं इन पर विश्वास भी करते हैं....लेकिन मेरा मन इन पर विश्वास करता है या नहीं...ये कहना मेरे लिए भी मुश्किल है....शायद मैं इन पर विश्वास करती हूँ.....लेकिन पूरी तरह से नहीं...

खैर बात यहाँ अपने धार्मिक ग्रंथों के अवतार की नहीं..."अवतार" फिल्म की कर रही हूँ......फिल्म पूरी तरह से काल्पनिक है.........फिर भी उसमे दिखाए गए दृश्य पूरी तरह से दर्शकों को बांध लेते है...जिस तरह से सभी जीवों और पेड़-पौधों का आपस में संबंध दिखाया गया है.....वो कहीं न कहीं सोचने पर मजबूर करता है कि हम भी तो पेड़-पौधों और जीवों से इस तरह का संबंध रखते है....ये सच है कि हमारा संबंध इतना करीबी नहीं है...लेकिन फिर भी है तो....

फिल्म में दिखाई गई जगह पर जाने और उस जीवन को जीने का मन होने लगता है...लेकिन कुछ ही पलों में जब उस प्राकृतिक दृश्यों को तबाह होते देखना पड़ता है....तो लगता है कि हम जो कुछ धीरे-धीरे प्रकृति के साथ कर रहे है....उसके एक बड़े रूप का सामना करना पड़ रहा है....इस तरह से उस खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य को तबाह होते देख मन में एक अजीब सी टीस उठती है.....थियेटर से निकलते वक़्त मैंने अपने मन में प्रकृति के प्रति एक अनोखा सा जुडाव महसूस किया....

इस तरह से कोई फिल्म मुझे प्रकृति से इस तरह से जोड़ देगी....सोचा ना था....

Wednesday, November 4, 2009

दुःख का अधिकार

आज एक पाठ पढ़ा रही थी......"दुःख का अधिकार"......इसमे लेखक यशपाल जी ने कितनी आसानी से समाज में होने वाले भेदभाव को दर्शाया है.......एक गरीब बूढी औरत को अपने बेटे की मृत्यु के अगले ही दिन अपने पोते और बीमार बहु का पेट पालने के लिए खरबूजे बेचने आना पड़ता है......उसका दुःख उसकी आखों से छलका जा रहा है...लेकिन वो मजबूर है.....उस पर से समाज के लोग उसके साथ सहानुभूति रखने की बजाय उसे कोसते हैं...उसे पत्थर दिल माँ,लालची,धर्म भ्रष्ट करने वाली और भी न जाने क्या-क्या कहते हैं...........उस वक्त लेखक को एक दूसरी सभ्रांत महिला की याद आती है...जिसने अपने बेटे की मृत्यु का ग़म एक महीने से भी ज्यादा मनाया था.....वो बार-बार बेहोश हो जातीं थीं....और महीनों दुख मानते हुए बिस्तर से भी नही उठीं थीं....बाजार की बात तो दूर ही है.........

इस कहानी को पढ़कर मुझे भी कहीं न कहीं ये बात चुभी कि क्या धनवान को हर हक़ नही मिल गया है..?...एक गरीब अपना त्यौहार-खुशी सब काम करते हुए ही मनाता है...लेकिन उसे तो दुःख तक मनाने के लिए समय नही मिलता......कोई भी त्यौहार हो शाम तक काम करता है,तो बच्चों को उस दिन कुछ ढंग का खाना नसीब होता है.....अगर त्यौहार के दिन रोटी के साथ दाल-सब्जीभी मिल जाए तो वो भी उन्हें किसी मिठाई से कम खुशी नही देती....हम-आप जैसे लोग महीनों पहले से त्योहारों की तैयारियों में जुटे रहते हैं....कैसे परदे....कैसी चादरें.....गुलदान कहाँ रखेंगे...कपड़े कैसे हों...वगेरह वगेरह.....लेकिन इन्हे परदे,कपड़े की तो बात ही छोडिये....उस दिन का खाना घर पर पूरा हो यही चिंता सताती है.....तभी तो ये दूसरो के घरों में साज-सज्जा को अपने घर की सोचकर करते हैं........सुख की बात तो फिर भी समझें लेकिन इन्हे तो दुःख मनाने की भी फुर्सत नही है....अगर एक दिन काम न करें तो खाना नसीब न हो...इस पर या तो दुःख मना लें या बच्चों के पेट की फिक्र करें.....और पेट की फिक्र तो हमेशा ऊपर होती है....ऐसे में ये अपना दुःख छुपाकर काम में लग जाते हैं और हम इन्हे इस पर भी बातें सुनाने से बाज़ नही आते...

कभी हममें से शायद ही किसी ने सच्चे दिल से इनके बारे में सोचा हो....आप में से तो शायद कई ऐसे होंगे भी जो इनके लिए कुछ कर पा रहे हों....लेकिन मैं अब तक ऐसा कुछ नही कर पाई हूँ............आशा है कभी तो कुछ करुँगी....
।
समाज की एक ऐसा वर्ग जो हमारी जरूरतों में अपनी जरूरतों को तलाशता है....हम ही उसकी जरूरतों को न समझेंगे.......सोचा ना था....

Thursday, October 1, 2009

बचपन के दिन

आजकल हर माता-पिता यही चाहते हैं की उनके बच्चे हर क्षेत्र में आगे रहें और इसके लिए वे बच्चे के जन्म से ही प्रयासरत हो जाते हैं....माँ अपने बच्चे को वो सब करवाना चाहती है,जो वो नही कर पायी...और यही उसके पिता भी चाहते हैं...कोई भी अपने बच्चे को किसी दूसरे बच्चे से कम नही देखना चाहते....अगर पड़ोस का बच्चा किसी क्षेत्र में अव्वल है तो उनका बच्चा क्यूँ नही...?..अपनी इस प्रतियोगिता में लीन माता-पिता अपने बच्चों की खुशी और रूचि की सुध लेना ही भूल जाते हैं...उन्हें इससे कोई मतलब भी नही होता कि वे जो कुछ बच्चे से करवाना चाह रहे हैं...बच्चा वो करना चाहता भी है या नही......

आज स्थिति ऐसी है कि छोटे-छोटे बच्चे अपनी स्कूल की ढेर सारी पढ़ाई के साथ-साथ अन्य प्रतियोगिताओं में भी व्यस्त रहते हैं....जिसके कारण न तो उन्हें खेलने का खाली समय मिलता है और न ही कहानियों की किताबें पढने का....मेरी पहचान का ही एक बच्चा,जो अभी कक्षा-३ में है....पाँच ट्यूशन जाता है...उसके अलावा वो स्वीमिंग की क्लास भी जाता है.... ऐसे में बच्चों का बचपन कहाँ जा रहा है?...ये सवाल भी हम ही पूछते हैं..बच्चे भी ऐसे वातावरण में रहकर अपनी मासूमियत भूल रहे हैं..क्यूंकि उनसे इतनी समझदारी की उम्मीद की जाती है...कि वहाँ मासूमियत के लिए कोई जगह नही रहती....कुछ दिनों पहले ही मैंने टी-वी पर किसी अवार्ड शो में एक बाल कलाकार की स्पीच सुनी...कहीं से भी ऐसा नही लग रहा था की वो कोई बच्ची है....हमने कभी उस उम्र में ऐसी समझदारी की बातें नही की...

बिना बचपन की मासूमियत और शरारत के बच्चा.......एक अजीब सा अहसास है..माँ-बाप कभी अपने ही बच्चे से उसका बचपन छीनेगे...सोचा ना था....

Thursday, August 27, 2009

कोई मिस तो नही कर रहा...

आज सुबह ही एक मिस कॉल आया...पिछले कई दिनों से इन मिस कॉल से परेशान हूँ.....वैसे मैंने पेपर में कुछ दिनों पहले ही पढ़ा था कि एक सर्वे के अनुसार भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ लोग एक-दूसरे को मिस कॉल देते हैं....अन्य किसी भी देश में लोग मिस कॉल नही करते......वैसे मैंने कई लोगों से सुना है कि कई दोस्तों की भी मिस कॉल की भाषा होती है...जिससे वे आपस में हाँ-न आसानी से समझ लेते हैं...बिना पैसे लगाये...शायद ये अच्छा भी हो...यहाँ तक तो बात फ़िर भी ठीक है,लेकिन कई बार लोग अपना पैसा बिल्कुल भी खर्च नही करना चाहते और हर वक्त मिस कॉल ही करते हैं....यहाँ एक चुटकुला याद आ रहा है..."एक कंजूस के घर आग लग गई.....और उसने अपना पैसा बचाने के लिए फायर ब्रिगेड वालों को भी मिस कॉल किया...लोगों के पूछने पर उसने कहा कि जब फायर ब्रिगेड वाले कॉल करेंगे तो उन्हें आग के बारे में भी बता दूँगा..."

जो भी हो भारत मिस कॉल के मामले में दुनिया में सबसे आगे होगा...सोचा ना था....

Tuesday, August 4, 2009

ये बंधन है कैसा....?

"रश्मि बेटा!बड़ी मौसी के घर भी राखी भेज दी है न...?
"नही माँ!तुम्हे याद नही है...भइया ने मुझे दो सालों से कभी कोई गिफ्ट ही नही भेजी...मैं ही कितने सालों राखी भेजती रहूँ ?...जब उन्हें गिफ्ट देना याद ही नही रहता..."
"रश्मि!ये कैसी बातें कर रही हो तुम...?हम राखी गिफ्ट के लिए नही बांधते...ये तो एक पवित्र बंधन है....गिफ्ट तो केवल शगुन होता है....वास्तव में तो ये एक रक्षा का वचन है.....जब द्रौपदी ने श्री कृष्ण की कलाई की चोट पर अपने आँचल का टुकडा बांधा था...तो उसने बदले में कुछ भी पाने की इच्छा नही की थी....वो तो उनका निस्वार्थ प्रेम था....फ़िर भी उसकी जरूरत के समय श्री कृष्ण ने उसकी मदद की..."
"लेकिन माँ....मैं उस जमाने की नही हूँ...."
"जानती हूँ....लेकिन भाई-बहन का प्यार तो उस जमाने से आज तक वही है..न...जब भी तुम्हे किसी चीज़ की जरूरत होती है...वो तुम्हे बिना मांगे ही तुम्हारे भाई लाकर देते है...तुम कभी भी परेशान हुई..तो उसे भी तुम्हारे भाइयों ने दूर किया...फ़िर भी तुम केवल गिफ्ट के बारे में सोचकर राखी बांधो..ये तो सही नही है न..."
"माँ!तो क्या मुझे उनसे कोई गिफ्ट नही लेनी चाहिए..."
"अरे पगली....मैंने ये तो नही कहा...भाई जो प्रेम से दे..उसे उतने ही प्रेम से लो...लेकिन कभी गिफ्ट के लिए अपने भाइयों से ये प्यारा बंधन न तोड़ना...समझीं...."
"समझी...माँ!अगर आज भी राखी भेजूगी तो समय पर मौसी को मिल जायेगी...मैं पहले ये काम करके आती हूँ....और हाँ..थैंक यू माँ..मुझे राखी का महत्त्व समझाने के लिए...."

जानती हूँ इस कहानी से कई बहनों को बुरा लग सकता है...लेकिन इसकी प्रेरणा भी एक बहन से ही मिली है.मैं राखी लेने के लिए गई थी..और अपने भाइयों के पसंद के हिसाब से राखियाँ निकालने में जुटी थी.....मम्मी से काफ़ी राय भी ले रही थी...तभी एक लड़की आई..और कुछ राखियाँ यूँही उठाकर मुझसे बोली..."इतनी मेहनत क्यूँ कर रही है...यार..मतलब तो गिफ्ट पाने से है..जो भी राखी बांधो,गिफ्ट तो मिलेगा ही..."
एक बार तो मुझे लगा कि मैं उसे अच्छा सा जवाब दे दूँ...लेकिन ऐसा करने से पहले ही मुझे विचार आया...कहीं न कहीं हम सभी के मन में ये बातें तो है न....उसने इसे यूँ ही बोल दिया..हम अपने भाइयों कि पसंद कि सारी चीजें करते हैं...लेकिन गिफ्ट कि चाह तो हमारे मन में होती ही है...

कोई बुरी सी लगने वाली बात हमारे भीतर भी जागने कि कोशिश कर रही है....क्या हम भी कभी गिफ्ट के लिए अपने भाइयों का प्यार भूल जायेंगे...नही...आज से ही हम सभी बहनों को ये प्रण लेना चाहिए कि "हम अपने भाइयों के लिए अपने अन्दर एक निस्वार्थ प्रेम जगाएँगी..."हम सभी कह सकती हैं कि हम अपने भाइयों से ऐसा ही प्रेम करती हैं...लेकिन एक बार ईमानदारी से सोचिये ये लालच तिल जितना ही सही.....हमारे अन्दर है...

एक बहन होकर भी कभी इस तरह की बातें लिखूंगी और बहनों का दिल दुखाउंगी....सोचा ना था....

Sunday, August 2, 2009

सच के साईड इफेक्ट्स

पिछले कुछ दिनों से न्यूज़ चैनल "सच का सामना"रियलिटी शो को बंद करवाने के लिए मचे बवाल के न्यूज़ से भरा रहा...आखिरकार इसे जारी रखने की मान्यता मिल ही गई.....सोचने की बात तो ये है कि क्या ये इतना बड़ा मुद्दा था...जिसे मंत्रालय में उठाया गया...?.....देखा जाए तो इससे भी कहीं अधिक गंभीर मुद्दों पर तो आज तक नजर भी नही डाली गई है...सूर्य ग्रहण के दिन विकलांग बच्चों को जमीन में गाड़ा गया....सरेआम एक महिला के साथ छेड़छाड़ हुई....और भी ऐसे कई मामले तात्कालिक थे..जिन पर विचार ज्यादा जरूरी थे....बजाय एक रियलिटी शो में पूछे जाने वाले बोल्ड सवालों पर टिप्पणी के.....

आज सभी के हांथों में रिमोट होता है....और लाखों चेनलों की भीड़ में हर एक अपने मन मुताबिक शो देखता है....हर व्यक्ति अपने पसंद के सीरियल देखता है उसपर कोई दबाव नही है कि उसे क्या देखना है और क्या नही...ये उसकी अपनी पसंद होती है.....हो सकता है जो शो किसी को रत्ती भर पसंद न हो वह किसी और का पसंदीदा शो हो.....हमने ऐसे भी कई शो देखें हैं जो जनता के कम सपोर्ट कि वजह से एक-दो हफ्तों में ही नौ दो ग्यारह हो गए.......तो क्यूँ न ये फ़ैसला भी जनता का ही हो....अगर अधिकाँश जनता इसके विरुद्ध होगी तो ये वैसे ही बंद हो जायेगा....

इस शो को बंद करने का मुद्दा उठाते हुए ये कहा गया था कि इससे भारतीय सभ्यता बिगड़ रही है.....उन सभी को क्या ये बात नही दिखाई दे रही कि जो प्रतियोगी आ रहे है और भारतीय सभ्यता के विरुद्ध पूछे गए सवालों का जवाब हाँ में दे रहे हैं....वे तो पहले ऐसा कोई शो नही देखे थे बिगड़ने के लिए....या देख कर भी बिगडे हो तो भी उस वक्त तो हमारे देश में ऐसे शो नही थे.....अगर किसी को बिगड़ना है तो उसे आप रोक नही सकते...कम से कम दबा कर तो नही.....प्यार से काम जरूर हो सकता है....

एक सवाल ये भी उठाया गया की लोग पैसों की वजह से सच बोलने आ रहे हैं.....तो इसमे बुरा क्या है..?कोई सच बोलना चाहता है...फ़िर भले ही लालच में ही क्यूँ न बोले...?...मेरा भी मानना है कि कई बार प्रश्न ऐसे होते है कि उनके जवाब से व्यक्ति का जीवन बरबाद हो सकता है...लेकिन ये तो प्रतियोगी के ऊपर होता है..उस पर कोई दबाव नही होता..वो जब चाहे खेल छोड़ सकता है....इस बात में आप और हम सवाल क्यूँ उठाएं जब कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से कोई काम कर रहा है...

मेरा तो यही मानना है की समय के हिसाब से सभी को बदलना चाहिए...कोई भी सभ्यता इतनी कमजोर नही होती की उसे इतनी आसानी से बिगड़ना सम्भव हो...समलैंगिकता को भी मान्यता मिलने पर इसी तरह का बवाल उठा....उन्हें मान्यता हाल ही में मिली है...लेकिन वे तो बरसों से ऐसे ही जी रहे हैं...मान लीजिये की फ़िर से समलैंगिगता को गैर कानूनी करार दे भी दिया जाए तो क्या परिस्थिति सुधर जायेगी...?....ऐसा कुछ नही होगा....तो क्या ये सही नही है की जो जैसे जीना चाहता है उसे वैसे ही जीने दिया जाए...?समाज बदल रहा है..क्यूंकि लोग बदल रहे हैं....आज तो हमारी कई मान्यताएं भी बदलने लगीं हैं....इसमे बुराई भी क्या है?......जीवन में बदलाव जरूरी है.....ऐसा तो हर बार नही हो सकता न की जो आपको पसंद न हो उसे दुनिया भी पसंद न करे....कई बार तो ये विरोध आपको अपने घर में भी मिल सकता है.....इसलिए सच्चाई से साक्षात्कार करें....

राजा हरिश्चंद्र के इस भारत में सच बोलने पर इतने सवाल उठेंगे......सोचा ना था....