Thursday, April 15, 2010

एक गंभीर मुद्दा

कल अपनी सहेली के घर गयी....हम आपस में बातें कर रहे थे...हमारे हाथ से एक पेन गिर गया....उसकी मम्मी घबराकर दौड़ती हुई आई...."क्या हुआ...?...........क्या गिरा......?......चोट तो नहीं लगी...?
"नहीं...आंटी सिर्फ एक पेन ही तो गिरा है...."
आंटी बार-बार आतीं कभी चाय पूछती....कभी नाश्ता.......कभी हम ठीक हैं या नहीं ये देखने आ जाती.....

घर वापस आई....तो शायद आंटी को साथ दिमाग में ही ले आई थी............मैं सोचने लगी की वो ऐसा क्यूँ कर रहीं थी...?
अक्सर देखने में आता है...कि माता-पिता या तो बच्चों पर ज़रूरत से ज्यादा ही ध्यान देते हैं या फिर देते ही नहीं.....कुछ ४० फीसदी ही ऐसे होंगे (मेरी नज़र में) जो बच्चों का उतना ही ध्यान रखते हैं,जितना बच्चों के लिए सही हो.....

माता-पिता का ये ओवर पोजेसिव होना कभी-कभी बच्चों के आत्मविश्वास को डिगा देता है....बच्चे अपने माता-पिता पर इतने निर्भर हो जाते हैं की उन्हें बाहर के लोगों से मिलने में एक अजीब सी झिझक महसूस होने लगती है....ऐसे बच्चों को कई बार उनके उन दोस्तों की जिंदगी ज्यादा अच्छी लगती है...जिनके माता-पिता उनकी किसी भी बात पर ध्यान नहीं देते.......इसके विपरीत जिन बच्चों के माता-पिता उन पर ध्यान नहीं देते...वे अपने उन दोस्तों सी जिंदगी चाहते हैं...जिनके माता-पिता उनकी हर छोटी -बड़ी चीजों का ध्यान रखते हैं.....बच्चे कई बार माता-पिता की ज्यादा देखभाल से टेंशन में आ जाते हैं....तो कभी बिलकुल ध्यान न देने के कारण...

मेरी एक सहेली थी...अनीता......वो चाहे कितना भी अच्छा काम क्यूँ न कर ले उसके घर में कभी उसकी तारीफ नहीं होती थी........जबकि मेरी एक दूसरी सहेली मीना के साथ बिलकुल उल्टा था.... वो अगर खुद पानी लेकर पी ले तो भी उसकी तारीफ दिन भर होती थी........मीना शुरुवात में अपनी तारीफ से खुश होती थी...लेकिन बाद में उसे एक आसान  से काम के लिए तारीफें नहीं सुहाती.....इसलिए उसे अनीता का परिवार अच्छा लगता....लेकिन तारीफों के लिए तरसती अनीता को मीना का परिवार अच्छा लगता.........

कई माता-पिता का बच्चों पर इतना दबाव है कि बच्चा अपनी असफलताओं का सामना करने से पहले ही मौत को गले लगा लेता है...आये दिन न्यूज़ में बच्चों की आत्महत्या की ख़बरें आती रहती हैं.....कुछ माता-पिता अपने बच्चों को स्टार बनाने के सपने बचपन से ही देखने लगते हैं.....पिछले दिनों एक डांस रियलिटी शो के ऑडिशन में कई ३-५ साल की बच्चियों ने छोटे कपडे पहनकर आयटम डांस किये......कुछ शो में भले ही इसे बढ़ावा न दिया गया...लेकिन माता-पिता ने अपने बच्चे को ऐसा करने तो दिया न.....ऐसा करते हुए उन्हें अपने बच्चे की मासूमियत छीनने की ग्लानी नहीं हुई......

ऐसी न जाने कितनी ही बातें हैं;ये विषय इतना छोटा नहीं की इसे किसी एक ब्लॉग की पोस्ट में समां लिया जाये...ये एक बहुत ही विस्तृत मुद्दा है.......शायद कुछ माता-पिता को मेरी ये बातें बुरी लगें....तो वो एक बार स्वयं को केवल उपरोक्त ही नहीं हर संभावित मुद्दों पर जांच लें कि वे ऐसे माता-पिता की श्रेंणी में आते हैं या नहीं....अगर नहीं आते तो बुरा मानने की कोई बात ही नहीं....लेकिन आते हैं'तो बुरा मानने का कोई अधिकार मैं उन्हें नहीं देती........

कुछ दिनों पहले न्यूज़ में देखा.....भगवान् का आशीर्वाद दिलाने के लिए माता-पिता नवजात बच्चों के ऊपर खौलती हुई खीर डलवाने को भी तैयार थे,कभी बच्चों को छत फेंका जाता है,कभी लात से रौंदा जाता है....जो दृश्य हम टी.वी. पर देख नहीं पा रहे थे....वे उनके माता-पिता कैसे देखते है.....बल्कि सिर्फ देखते ही नहीं ऐसा करने के लिए रजामंदी भी देते हैं...कोई भी माँ अपने बच्चों को ऐसे ज़ुल्म सहने के लिए सहर्ष दे देगी....सोचा न था...

Tuesday, April 6, 2010

हमारी पहचान कहाँ है...?

आज वोटर आई.डी. के विषय में पूछताछ के लिए कुछ लोग आये....उनका पहला सवाल था,
"ये आपका अपना घर है या किराये का?.....
"किराये का...."
"ठीक है...कोई बात नहीं..."
"....लेकिन आप किस लिए पूछ रहे हैं॥?"
"वो वोटर आई.डी.के लिए......"
"तो जिनका अपना घर नहीं है...वो कैसे वोट देंगे...?"
...आपका अपना घर जहां है..आप वहीँ वोट दे सकते हैं....जवाब मिला...
"लेकिन हम तो पिछले कई सालों से यहाँ रह रहे हैं....तो हम वहाँ वोट देने कैसे जाएँ..."
"....वो तो नहीं पता..लेकिन आपका जहां लिस्ट में नाम होगा आप वहीँ वोट दे सकते हैं..."इस जवाब के साथ वो तो अपना पल्ला झाड़कर चल दिए...और हमारे मन में देश की स्थिति को लेकर कई सवाल हिलोरे लेने लगे....

सोचने कि बात है...(कुछ भी करने से पहले सोचना तो पड़ेगा ही...).....देश में करीब ४० फीसदी लोग तो ऐसे हैं,जिनके पास खुद का मकान होगा ही नहीं....वैसे भी जहां खाने-पीने की चीजें इतनी महंगी हो रही है..वहाँ कोई दाल-रोटी खा रहा है तो उसके जितना अमीर कोई नहीं....ऐसे में जिन्होंने भी पिछले साल घर बनाने या खरीदने के सपने देखे होंगे....वे अपने सपनों से कुछ दूर तो हो ही गए हैं...अब कोई घर न खरीद पाए और किराये के घर में रहे...तो ऐसा तो नहीं कहा जा सकता की वो भारत का नागरिक नहीं है.....या अगर उसका घर किसी और शहर में है भी...तो उसे चुनाव के दिन वोट करने के लिए उसके शहर वापस जाना पड़े....

सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस तरह से क्या हम भारत की जनसँख्या का सही आंकड़ा निकाल पाएंगे...?...और अगर ये आंकड़े ही गलत हुए तो इस पर आधारित अन्य आंकड़े कहाँ तक सही होंगे...?......एक आलिशान बंगले में रहने वाला और फूटपाथ में सोने वाला दोनों ही संविधान की नज़र में सामान है..दोनों को ही सामान अधिकार प्राप्त हैं....ये अलग बात है की इन्हें भ्रष्ट समाज में सामान अधिकार नहीं मिल पाते.....लोग फूटपाथ पर सोने वालों को महंगी गाड़ियों के नीचे दबाकर भी बच जाते हैं...........लेकिन हम इनसे इनकी राष्ट्रीयता का अधिकार नहीं छीन सकते....जब हमें किराये के घर में रहने के कारण वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किया जा रहा है.....तो जिनके पास सर छुपाने की जगह नहीं है....उनसे कितने अधिकार छीने जा रहे होंगे....इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता...

देश का एक महत्वपूर्ण काम "जनगणना" ही जब इस तरह से हो रहा है....तो बाकी वादों और दावों का खोखलापन हम टटोल सकते हैं....अपना घर न होने के कारण हमें हमारे मतदान के अधिकार से वंचित रहना होगा....सोचा ना था....

Sunday, March 28, 2010

डार्लिंगजी :पुस्तक समीक्षा

नर्गिस और सुनील दत्त की जोड़ी हमेशा हमारे लिए एक आयडियल जोड़ी रही है...लेकिन उनके मिलने की कहानी भी किसी फ़िल्मी कहानी से कम पेंचीदा नहीं है....जहाँ एक ओर बचपन से अपनी माँ के द्वारा नर्गिस सिनेमा-जगत में आ चुकी थी.....वहीँ सुनील दत्त..जिनका नाम बलराज दत्त हुआ करता था....अपने पिता की मृत्यु के बाद से ही माँ और छोटे भाई-बहन की जिम्मेदारियां सँभालने में लगे थे....उन्होंने बंटवारे की पीड़ा भी झेली....क्लर्क की नौकरी के बाद रेडियो की नौकरी और फिर फ़िल्मी सफ़र की शुरुवात (जिसमे भी कई बाधाएँ आती रही)...इतनी आसान नहीं रहीं...लेकिन उसका कुछ अंदाज़ा "किश्वर देसाई" की इस पुस्तक "डार्लिंगजी" से लगाया जा सकता है.......

जहां एक ओर नर्गिस एक मशहूर अभिनेत्री बन चुकी थीं...वहीँ सुनील का फिल्म-जगत में कोई नाम न था...नर्गिस को राज कपूर भा गए...और उन्होंने बिना किसी की परवाह किये..राज के साथ चलने का फैसला किया....राज पहले से शादीशुदा थे...लेकिन फिर भी नर्गिस उनके आकर्षण में बंधती चली गयी...नर्गिस ने राजकपूर के साथ कई फिल्मों में काम किया..ओर एक वक्त ऐसा आया जब वो राज के साथ ही काम करती थीं...उस समय वे केवल राज की बात ही मानती थी...राज ने नर्गिस को कई फिल्मों में काम करने से मना किया...इनमे से एक थी...मुगल-ए-आज़म...

"मुग़ल-ए-आज़म के समय नर्गिस एक बार फिर राजकपूर की इच्छाओं के नीचे दब गयी...........पहले,आसिफ ने इस फिल्म के लिए चन्द्रमोहन और नर्गिस को साइन किया था...नर्गिस का वही किरदार था जो बाद में मधुबाला ने किया था.....चन्द्रमोहन दस रील बनने के बाद ही चल बसे फिर आसिफ ने दिलीप कुमार और नर्गिस के साथ दुबारा शूटिंग की.पर राजकपूर ने कहा कि नर्गिस उस फिल्म में काम नहीं करेगी।

इसी तरह राज कपूर की कामयाबी के पीछे नर्गिस का बहुत बड़ा हांथ रहा....

"...आवारा'से 'आह' और 'श्री ४२० 'तक के रोल छोटे होते चले गए। बेशक वो राजकपूर की चाहत थी,पर उसकी कामयाबी बढती गयी और नर्गिस की क़द्र कम होती गयी."

"'बरसात','आवारा','श्री ४२०'.लगातार तीन हिट देने से राज कपूर निर्माता,निर्देशक और अभिनेता के रूप में छा गया और कोई भी उसके किसी भी किरदार में गलती न निकाल सका.अगर उसे शुरुवात में नर्गिस की जरुरत थी,उसे अब यक़ीनन उसकी ज़रूरत न थी.वह एक सितारा बन चूका था,नर्गिस से कहीं बड़ा स्टार ।"

इस तरह की नर्गिस की ज़िन्दगी से जुडी बातों के साथ-साथ नर्गिस और सुनील दत्त के जीवन की कई बातों को इस किताब में शामिल किया गया है.....जब सुनील दत्त ने "मदर इंडिया" की शूटिंग के दौरान अपनी जान पर खेलकर नर्गिस की जान बचाई.....इससे उनकी ज़िन्दगी ने एक नया मोड़ लिया....अपने इलाज के वक्त नर्गिस और सुनील दत्त करीब आ गए ओर उन्होंने शादी का फैसला कर लिया....नर्गिस ने सुनील दत्त से अपने बारे में खुलकर सारी बातें कीं....

"उसने कहा कि अपनी ज़िन्दगी की एक-एक बात इस तरह बताते हुए उसे कोई शर्म नहीं थी,और उसे किसी भी बात की चिंता नहीं थी,क्यूंकि वह जानती थी..'मुझे रोने के लिए सुनील के कंधे हमेशा मिलेंगे-और मैं यह भी जानती हूँ कि उसके कपडे मेरे आंसू सोख लेंगे न कि लोगों की हंसी या मज़ाक बनने के लिए छोड़ दिए जायेंगे..."

आपस में इतना प्यार और मान-सम्मान होते हुए भी उन्होंने कई सालों तक अपने प्यार को छुपाए रखा...इसके कई कारण थे...एक तो वो 'मदर इंडिया' में माँ-बेटे की भूमिका में थे...ऐसे में जनता को उनका ऐसा रिश्ता पसंद न आता....दूसरा सुनील दत्त अभी इतने बड़े कलाकार नहीं थे...उन पर ये इल्ज़ाम लगाया जाता ..कि वो नर्गिस को अपनी सफलता की सीढ़ी बनाना चाहते हैं...वहीँ नर्गिस भी नहीं चाहती थी कि राजकपूर से रिश्ता टूटने के तुरंत बाद ही उनका नाम किसी और के साथ जुड़े,इससे उनकी छवि पर असर पड़ता..इसके अलावा इसी तरह के और भी कई कारण थे..जो इस पुस्तक में बताये गए हैं...सो उन दोनों को न चाह कर भी एक दूसरे से दूरी बना कर रखनी पड़ती थी...वे आपस में पत्र लिखा करते थे जिसमे वे अपना नाम पिया और हे देयर लिखते थे......ताकि किसी को उनके रिश्ते के बारे में पता न चले..........

रिश्तों के इस लम्बे दौर में उनके सामने कई मुश्किलें भी आई......जिनका इस पुस्तक में उल्लेख है...इसे सुनी-सुनाई बातें नहीं कहा जा सकता क्यूंकि इसमें उनके पत्रों को शामिल किया गया है,इस पुस्तक में सुनील दत्त और नर्गिस के प्यार और समर्पण को जानने का मौका मिलता है...इसमें नर्गिस की ज़िन्दगी में मिसेज नर्गिस दत्त बनने के बाद आये बदलाव को भी बताया गया है...उनके आखरी पलों को भी बड़ी बारीकी से शामिल किया गया जो बहुत ही मार्मिक हैं.....उनके बच्चों को भी इसमें शामिल किया गया है...नर्गिस के एक अभिनेत्री,एक बुआ,एक प्रेमिका,एक पत्नी,एक माँ,एक भाभी और एक समाज सेविका...इस तरह के उनके कई रूपों को इसमें शामिल किया गया है...साथ ही सुनील दत्त के जीवन को भी बखूबी उजागर किया गया है.....

इस पुस्तक से काफी हदतक फ़िल्मी दुनिया की सच्चाई से रूबरू होने का मौका मिलता है...हम सभी फ़िल्मी सितारों से इस हद तक प्रभावित रहते हैं कि उनकी निजी ज़िन्दगी में क्या हो रहा है इसकी उत्सुकता बनी रहती है...और हमारी इसी उत्सुकता को पूरी करने के लिए रिपोर्टर्स और मीडिया उन पर नज़र रखते हैं......इससे उनका जीवन कितना मुश्किल हो जाता है..वो अपनी ज़िन्दगी आज़ादी से जी ही नहीं पाते..कहीं न कहीं ये सवाल अपने आप से पूछने का मन करता है कि..क्या हमें उन्हें उनकी ज़िन्दगी आज़ादी से नहीं जीने देना चाहिए?

उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की हमारी चाह उनकी आज़ादी छीन लेती है...उन्हें अपने स्टार होने की ये एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है..फ़िल्मी दुनिया के चकाचौंध में चमकने वाले ये सितारे अपनी ज़िन्दगी आज़ादी से जी नहीं पाते और इसका कारण हम उनके चाहने वाले हैं.....सोचा ना था....

Tuesday, March 16, 2010

गुडी पडवा


गुडी पडवा...चैत्र मास का पहला दिन...जो की हिंदी कैलेंडर के नए साल का पहला दिन है....इसे महाराष्ट्र में नए साल के रूप में मनाया जाता है....इस दिन को शादी,नए काम शुरू करने,गहने और नयी संपत्ति खरीदने के लिए शुभ माना जाता है...गुडी पडवा एक ऐसा त्यौहार है...जिसकी शुरुवात कड़वा खाकर की जाती है...आज के दिन नीम की पत्तियाँ खाई जाती हैं...कहा जाता है...नीम की पत्तियाँ खाने से मन के अन्दर की सारी कडवाहट मिट जाती है....वैसे ये भी माना जाता है कि आज के दिन सुबह खाली पेट ७ कोमल नीम की पत्तियाँ और थोड़ी काली मिर्च खाने से साल भर बुखार नहीं होता॥

आज के दिन गुडी बनाकर उसकी पूजा की जाती है...जिसके लिए एक साडी को पूरी तरह पटली बनाकर एक लोटे में लकड़ी के सहारे खड़ा किया जाता है...इसे अपने घर में आँगन,छत या दरवाजे पर लगा कर पूजा करते हैं..इसमें बताशे की माला चढ़ाई जाती है....और पूजा की जाती है.....महाराष्ट्र में न केवल घरों में बल्कि दुकानों में भी इस तरह से गुडी बनाकर पूजा की जाती है...आज पूरनपोली भी बनाई जाती है...

मेरी और से सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं....आज नवरात्री का पहला दिन भी है....आज के दिन महाराष्ट्रियन त्यौहार के बारे में कुछ ज्यादा लिखने की चेष्टा की है...जो भी देखा वैसा ही लिखा.....कोई गलती हो गयी हो तो माफ़ करने के साथ ही सुधार भी करें....वैसे किसी की भावनाओं को ठेस पहुचने के बारे में....सोचा ना था....


Friday, March 12, 2010

द टाइम ट्रेवलर्स वाइफ:पुस्तक समीक्षा

दो दिन पहले ही ''द टाइम ट्रेवलर्स वाइफ"पढ़कर पूरी की....शुरुवात में मुझे ये बुक थोड़ी अजीब लगी...लेकिन जब मैं इसे पढ़ती गयी..तो इस अजीब-सी लगने वाली बुक ने मुझे खुद से बाँध लिया...जब भी समय मिलता बस मैं इसे पढने में लग जाती..और धीरे-धीरे मैं न सिर्फ इस बुक से,बल्कि इसके किरदारों से भी जुड़ गयी...अब तक की मेरी पढ़ी हुई सभी पुस्तकों में से ये एक ऐसी बुक है..जो पूरी तरह से काल्पनिक है....लेकिन फिर भी ये मुझे बांधे रखने में सफल हुई....

इस बुक की सबसे बड़ी ख़ासियत है...इसके किरदार..हेनरी और क्लेअर...जो की एक दूसरे से पहली बार तब मिले जब हेनरी ३६ साल का और क्लेयर ६ साल की थी...और दोनों ने शादी की तब हेनरी ३० साल का और क्लेयर २२ साल की थी...ये अजीब जरूर लगता है...लेकिन ये ही सच है...इसका कारण है हेनरी की एक अनोखी बीमारी...जिसके कारण हेनरी अचानक ही अपने बीते समय या भविष्य में चला जाता है...इस पर हेनरी का कोई बस नहीं चलता....

वहीँ दूसरी ख़ासियत है...इसका लेखन....लेखक ने बहुत ही ख़ूबसूरती और प्यार से इस बुक को लिखा है...ये बात बुक को पढ़ते हुए ज़ाहिर होती है...हर पैराग्राफ बहुत ही बारीकी से लिखा जान पड़ता है...हर परिस्थिति,हर भाव,आसपास की जानकारी,मौसम का उल्लेख...इतना उम्दा है की पाठक को ऐसा लगता है...जैसे वो कोई बुक नहीं पढ़ रहा,बल्कि उस बुक का ही एक हिस्सा हो...यही कारण है कि,पाठक को इस बुक और उसके किरदारों से लगाव हो जाता है.....

इस बुक को पढना उन लोगों के लिए बहुत ही अच्छा हो सकता है..जो खुद भी बुक लिखना चाहते हों...इससे पाठकों को बांधकर रखने का गुर सीखा जा सकता है..और प्रभावशाली लेखन भी.....

जब तक मैं इस बुक को पढ़ती रही मैंने खुद को एक रोमांचक यात्रा में पाया....मैंने कहीं पढ़ा था.."एक अच्छी बुक वो होती है...जिसे पूरी करने के बाद आपको ऐसा लगे,जैसे आप अपने किसी दोस्त से बिछड़ गए हों..".....कुछ दिनों पहले तक मेरे लिए ये किसी की कही हुई बात थी...लेकिन आज ये मेरा अनुभव है....किसी बुक और उसके किरदारों से यूँ जुडाव हो जायेगा.....सोचा ना था....

Friday, February 26, 2010

दुआ की कीमत

फरवरी की शुरुवात में ही हम अजमेर गए...वैसे हमारा १० दिनों का लम्बा प्लान था.....अजमेर पहुँचकर अपने भाई के दोस्त के घर पर फ्रेश हुए....फिर मशहूरअजमेर शरीफ (दरगाह) गए.....वहां ३ बजे पहुँचने पर पता चला कि अन्दर जाने के लिए ४ बजे तक का इंतजार करना होगा...सो हमने उस एक घंटे को आसपास की दुकाने देखने और छोटी देग और बड़ी देग देखने में बिताया....बाद में हम सभी ने मिलकर दरगाह में चादर चढ़ाई और दर्शन किये....यहाँ मुझे केवल एक ही बात खली....वो ये की यहाँ जो खुदा के खिदमतगार खड़े होते हैं...उन्हें वहां दर्शन के लिए आये लोगों से कदम-कदम पर पैसे मांगते हुए देखा जा सकता है....जिन्हें यदि मना किया जाये या टाला जाये...तो दो पल पहले दुआ देती उनकी जुबान लोगों को बददुआ देने में ज़रा भी देर नहीं करती.......और उनकी बददुआये उनकी दुआओं की तुलना में कुछ ज्यादा दिल से निकली लगती हैं.....

दरगाह के पास खड़े लोग आपकी श्रद्धा -भावना को चादर पर चढ़े रुपयों के हिसाब से तौलते हैं.....अगर आपको वे एक धागा भी हाँथ में बांधते हैं,तो उससे पहले वो आपसे पैसे मांगते हैं......यही हाल अजमेर के तारागढ़ की मज़ार का था....यहाँ तो अन्दर घुसने से पहले ही दरवाजे पर पैसे चढाने को कहा जाता है........अन्दर जाकर दर्शन करने पर भी पैसे की मांग ज़ारी रहती है.............

ऐसी किसी दरगाह या मज़ार पर जाकर इंसान कुछ पलों के लिए खुद को परमेश्वर के करीब महसूस करना चाहता है.......वो चाहता है कि कुछ पल अपने दुख-दर्द को भुलाकर शांति का अनुभव करे,लेकिन ऐसा करना अब कुछ मुश्किल सा होता जा रहा है.........ऐसे इंसान जिन्होंने शायद अपनी ज़िन्दगी में कभी पैसों को इतना महत्व नहीं दिया होगा और इसी वजह से शायद उन्हें इतना बड़ा ओहदा मिला...उनकी मजारें यहाँ बनी हुई हैं,जिन पर लाखों लोग आकर सजदा करते हैं...लेकिन आज इनकी मजारों को ही व्यवसाय का जरिया बनाया जा रहा है......इन्होने कभी ऐसा.....सोचा ना था....

Wednesday, January 13, 2010

अवतार


अवतार,ये शब्द हमारे जेहन में कई काल्पनिक चित्रों को एक साथ लाकर खड़ा करता है.....काल्पनिक इसलिए लिखा;क्यूंकि जब भी मैं अपने धार्मिक ग्रंथों में उल्लेखित अवतारों के बारे में सुनती या पढ़ती हूँ..तो मन में वास्तविकता और काल्पनिकता का एक द्वंद्व शुरू हो जाता है.........हम सभी कहीं न कहीं इन पर विश्वास भी करते हैं....लेकिन मेरा मन इन पर विश्वास करता है या नहीं...ये कहना मेरे लिए भी मुश्किल है....शायद मैं इन पर विश्वास करती हूँ.....लेकिन पूरी तरह से नहीं...

खैर बात यहाँ अपने धार्मिक ग्रंथों के अवतार की नहीं..."अवतार" फिल्म की कर रही हूँ......फिल्म पूरी तरह से काल्पनिक है.........फिर भी उसमे दिखाए गए दृश्य पूरी तरह से दर्शकों को बांध लेते है...जिस तरह से सभी जीवों और पेड़-पौधों का आपस में संबंध दिखाया गया है.....वो कहीं न कहीं सोचने पर मजबूर करता है कि हम भी तो पेड़-पौधों और जीवों से इस तरह का संबंध रखते है....ये सच है कि हमारा संबंध इतना करीबी नहीं है...लेकिन फिर भी है तो....

फिल्म में दिखाई गई जगह पर जाने और उस जीवन को जीने का मन होने लगता है...लेकिन कुछ ही पलों में जब उस प्राकृतिक दृश्यों को तबाह होते देखना पड़ता है....तो लगता है कि हम जो कुछ धीरे-धीरे प्रकृति के साथ कर रहे है....उसके एक बड़े रूप का सामना करना पड़ रहा है....इस तरह से उस खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य को तबाह होते देख मन में एक अजीब सी टीस उठती है.....थियेटर से निकलते वक़्त मैंने अपने मन में प्रकृति के प्रति एक अनोखा सा जुडाव महसूस किया....

इस तरह से कोई फिल्म मुझे प्रकृति से इस तरह से जोड़ देगी....सोचा ना था....