Thursday, October 1, 2009

बचपन के दिन

आजकल हर माता-पिता यही चाहते हैं की उनके बच्चे हर क्षेत्र में आगे रहें और इसके लिए वे बच्चे के जन्म से ही प्रयासरत हो जाते हैं....माँ अपने बच्चे को वो सब करवाना चाहती है,जो वो नही कर पायी...और यही उसके पिता भी चाहते हैं...कोई भी अपने बच्चे को किसी दूसरे बच्चे से कम नही देखना चाहते....अगर पड़ोस का बच्चा किसी क्षेत्र में अव्वल है तो उनका बच्चा क्यूँ नही...?..अपनी इस प्रतियोगिता में लीन माता-पिता अपने बच्चों की खुशी और रूचि की सुध लेना ही भूल जाते हैं...उन्हें इससे कोई मतलब भी नही होता कि वे जो कुछ बच्चे से करवाना चाह रहे हैं...बच्चा वो करना चाहता भी है या नही......

आज स्थिति ऐसी है कि छोटे-छोटे बच्चे अपनी स्कूल की ढेर सारी पढ़ाई के साथ-साथ अन्य प्रतियोगिताओं में भी व्यस्त रहते हैं....जिसके कारण न तो उन्हें खेलने का खाली समय मिलता है और न ही कहानियों की किताबें पढने का....मेरी पहचान का ही एक बच्चा,जो अभी कक्षा-३ में है....पाँच ट्यूशन जाता है...उसके अलावा वो स्वीमिंग की क्लास भी जाता है.... ऐसे में बच्चों का बचपन कहाँ जा रहा है?...ये सवाल भी हम ही पूछते हैं..बच्चे भी ऐसे वातावरण में रहकर अपनी मासूमियत भूल रहे हैं..क्यूंकि उनसे इतनी समझदारी की उम्मीद की जाती है...कि वहाँ मासूमियत के लिए कोई जगह नही रहती....कुछ दिनों पहले ही मैंने टी-वी पर किसी अवार्ड शो में एक बाल कलाकार की स्पीच सुनी...कहीं से भी ऐसा नही लग रहा था की वो कोई बच्ची है....हमने कभी उस उम्र में ऐसी समझदारी की बातें नही की...

बिना बचपन की मासूमियत और शरारत के बच्चा.......एक अजीब सा अहसास है..माँ-बाप कभी अपने ही बच्चे से उसका बचपन छीनेगे...सोचा ना था....

Thursday, August 27, 2009

कोई मिस तो नही कर रहा...

आज सुबह ही एक मिस कॉल आया...पिछले कई दिनों से इन मिस कॉल से परेशान हूँ.....वैसे मैंने पेपर में कुछ दिनों पहले ही पढ़ा था कि एक सर्वे के अनुसार भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ लोग एक-दूसरे को मिस कॉल देते हैं....अन्य किसी भी देश में लोग मिस कॉल नही करते......वैसे मैंने कई लोगों से सुना है कि कई दोस्तों की भी मिस कॉल की भाषा होती है...जिससे वे आपस में हाँ-न आसानी से समझ लेते हैं...बिना पैसे लगाये...शायद ये अच्छा भी हो...यहाँ तक तो बात फ़िर भी ठीक है,लेकिन कई बार लोग अपना पैसा बिल्कुल भी खर्च नही करना चाहते और हर वक्त मिस कॉल ही करते हैं....यहाँ एक चुटकुला याद आ रहा है..."एक कंजूस के घर आग लग गई.....और उसने अपना पैसा बचाने के लिए फायर ब्रिगेड वालों को भी मिस कॉल किया...लोगों के पूछने पर उसने कहा कि जब फायर ब्रिगेड वाले कॉल करेंगे तो उन्हें आग के बारे में भी बता दूँगा..."

जो भी हो भारत मिस कॉल के मामले में दुनिया में सबसे आगे होगा...सोचा ना था....

Tuesday, August 4, 2009

ये बंधन है कैसा....?

"रश्मि बेटा!बड़ी मौसी के घर भी राखी भेज दी है न...?
"नही माँ!तुम्हे याद नही है...भइया ने मुझे दो सालों से कभी कोई गिफ्ट ही नही भेजी...मैं ही कितने सालों राखी भेजती रहूँ ?...जब उन्हें गिफ्ट देना याद ही नही रहता..."
"रश्मि!ये कैसी बातें कर रही हो तुम...?हम राखी गिफ्ट के लिए नही बांधते...ये तो एक पवित्र बंधन है....गिफ्ट तो केवल शगुन होता है....वास्तव में तो ये एक रक्षा का वचन है.....जब द्रौपदी ने श्री कृष्ण की कलाई की चोट पर अपने आँचल का टुकडा बांधा था...तो उसने बदले में कुछ भी पाने की इच्छा नही की थी....वो तो उनका निस्वार्थ प्रेम था....फ़िर भी उसकी जरूरत के समय श्री कृष्ण ने उसकी मदद की..."
"लेकिन माँ....मैं उस जमाने की नही हूँ...."
"जानती हूँ....लेकिन भाई-बहन का प्यार तो उस जमाने से आज तक वही है..न...जब भी तुम्हे किसी चीज़ की जरूरत होती है...वो तुम्हे बिना मांगे ही तुम्हारे भाई लाकर देते है...तुम कभी भी परेशान हुई..तो उसे भी तुम्हारे भाइयों ने दूर किया...फ़िर भी तुम केवल गिफ्ट के बारे में सोचकर राखी बांधो..ये तो सही नही है न..."
"माँ!तो क्या मुझे उनसे कोई गिफ्ट नही लेनी चाहिए..."
"अरे पगली....मैंने ये तो नही कहा...भाई जो प्रेम से दे..उसे उतने ही प्रेम से लो...लेकिन कभी गिफ्ट के लिए अपने भाइयों से ये प्यारा बंधन न तोड़ना...समझीं...."
"समझी...माँ!अगर आज भी राखी भेजूगी तो समय पर मौसी को मिल जायेगी...मैं पहले ये काम करके आती हूँ....और हाँ..थैंक यू माँ..मुझे राखी का महत्त्व समझाने के लिए...."

जानती हूँ इस कहानी से कई बहनों को बुरा लग सकता है...लेकिन इसकी प्रेरणा भी एक बहन से ही मिली है.मैं राखी लेने के लिए गई थी..और अपने भाइयों के पसंद के हिसाब से राखियाँ निकालने में जुटी थी.....मम्मी से काफ़ी राय भी ले रही थी...तभी एक लड़की आई..और कुछ राखियाँ यूँही उठाकर मुझसे बोली..."इतनी मेहनत क्यूँ कर रही है...यार..मतलब तो गिफ्ट पाने से है..जो भी राखी बांधो,गिफ्ट तो मिलेगा ही..."
एक बार तो मुझे लगा कि मैं उसे अच्छा सा जवाब दे दूँ...लेकिन ऐसा करने से पहले ही मुझे विचार आया...कहीं न कहीं हम सभी के मन में ये बातें तो है न....उसने इसे यूँ ही बोल दिया..हम अपने भाइयों कि पसंद कि सारी चीजें करते हैं...लेकिन गिफ्ट कि चाह तो हमारे मन में होती ही है...

कोई बुरी सी लगने वाली बात हमारे भीतर भी जागने कि कोशिश कर रही है....क्या हम भी कभी गिफ्ट के लिए अपने भाइयों का प्यार भूल जायेंगे...नही...आज से ही हम सभी बहनों को ये प्रण लेना चाहिए कि "हम अपने भाइयों के लिए अपने अन्दर एक निस्वार्थ प्रेम जगाएँगी..."हम सभी कह सकती हैं कि हम अपने भाइयों से ऐसा ही प्रेम करती हैं...लेकिन एक बार ईमानदारी से सोचिये ये लालच तिल जितना ही सही.....हमारे अन्दर है...

एक बहन होकर भी कभी इस तरह की बातें लिखूंगी और बहनों का दिल दुखाउंगी....सोचा ना था....

Sunday, August 2, 2009

सच के साईड इफेक्ट्स

पिछले कुछ दिनों से न्यूज़ चैनल "सच का सामना"रियलिटी शो को बंद करवाने के लिए मचे बवाल के न्यूज़ से भरा रहा...आखिरकार इसे जारी रखने की मान्यता मिल ही गई.....सोचने की बात तो ये है कि क्या ये इतना बड़ा मुद्दा था...जिसे मंत्रालय में उठाया गया...?.....देखा जाए तो इससे भी कहीं अधिक गंभीर मुद्दों पर तो आज तक नजर भी नही डाली गई है...सूर्य ग्रहण के दिन विकलांग बच्चों को जमीन में गाड़ा गया....सरेआम एक महिला के साथ छेड़छाड़ हुई....और भी ऐसे कई मामले तात्कालिक थे..जिन पर विचार ज्यादा जरूरी थे....बजाय एक रियलिटी शो में पूछे जाने वाले बोल्ड सवालों पर टिप्पणी के.....

आज सभी के हांथों में रिमोट होता है....और लाखों चेनलों की भीड़ में हर एक अपने मन मुताबिक शो देखता है....हर व्यक्ति अपने पसंद के सीरियल देखता है उसपर कोई दबाव नही है कि उसे क्या देखना है और क्या नही...ये उसकी अपनी पसंद होती है.....हो सकता है जो शो किसी को रत्ती भर पसंद न हो वह किसी और का पसंदीदा शो हो.....हमने ऐसे भी कई शो देखें हैं जो जनता के कम सपोर्ट कि वजह से एक-दो हफ्तों में ही नौ दो ग्यारह हो गए.......तो क्यूँ न ये फ़ैसला भी जनता का ही हो....अगर अधिकाँश जनता इसके विरुद्ध होगी तो ये वैसे ही बंद हो जायेगा....

इस शो को बंद करने का मुद्दा उठाते हुए ये कहा गया था कि इससे भारतीय सभ्यता बिगड़ रही है.....उन सभी को क्या ये बात नही दिखाई दे रही कि जो प्रतियोगी आ रहे है और भारतीय सभ्यता के विरुद्ध पूछे गए सवालों का जवाब हाँ में दे रहे हैं....वे तो पहले ऐसा कोई शो नही देखे थे बिगड़ने के लिए....या देख कर भी बिगडे हो तो भी उस वक्त तो हमारे देश में ऐसे शो नही थे.....अगर किसी को बिगड़ना है तो उसे आप रोक नही सकते...कम से कम दबा कर तो नही.....प्यार से काम जरूर हो सकता है....

एक सवाल ये भी उठाया गया की लोग पैसों की वजह से सच बोलने आ रहे हैं.....तो इसमे बुरा क्या है..?कोई सच बोलना चाहता है...फ़िर भले ही लालच में ही क्यूँ न बोले...?...मेरा भी मानना है कि कई बार प्रश्न ऐसे होते है कि उनके जवाब से व्यक्ति का जीवन बरबाद हो सकता है...लेकिन ये तो प्रतियोगी के ऊपर होता है..उस पर कोई दबाव नही होता..वो जब चाहे खेल छोड़ सकता है....इस बात में आप और हम सवाल क्यूँ उठाएं जब कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से कोई काम कर रहा है...

मेरा तो यही मानना है की समय के हिसाब से सभी को बदलना चाहिए...कोई भी सभ्यता इतनी कमजोर नही होती की उसे इतनी आसानी से बिगड़ना सम्भव हो...समलैंगिकता को भी मान्यता मिलने पर इसी तरह का बवाल उठा....उन्हें मान्यता हाल ही में मिली है...लेकिन वे तो बरसों से ऐसे ही जी रहे हैं...मान लीजिये की फ़िर से समलैंगिगता को गैर कानूनी करार दे भी दिया जाए तो क्या परिस्थिति सुधर जायेगी...?....ऐसा कुछ नही होगा....तो क्या ये सही नही है की जो जैसे जीना चाहता है उसे वैसे ही जीने दिया जाए...?समाज बदल रहा है..क्यूंकि लोग बदल रहे हैं....आज तो हमारी कई मान्यताएं भी बदलने लगीं हैं....इसमे बुराई भी क्या है?......जीवन में बदलाव जरूरी है.....ऐसा तो हर बार नही हो सकता न की जो आपको पसंद न हो उसे दुनिया भी पसंद न करे....कई बार तो ये विरोध आपको अपने घर में भी मिल सकता है.....इसलिए सच्चाई से साक्षात्कार करें....

राजा हरिश्चंद्र के इस भारत में सच बोलने पर इतने सवाल उठेंगे......सोचा ना था....

Thursday, July 16, 2009

लड़कों के साथ भेदभाव

कल पार्क में बैठी थी की तभी दो महिलाओं में बच्चों की लडाई को लेकर बहस छिड़ गई....एक महिला लड़कियों की माँ थीं और वो दूसरी के लड़के की शिकायत कर रहीं थीं...बाद में पता चला की गलती लड़कियों की ही थी...और उनकी माँ को चुप होना पड़ा...ये बातें मुझे कहीं न कहीं ये बात सोचने पर मजबूर करीं...हम हमेशा लड़कियों को प्रोटेक्ट करने के लिए लड़कों को ही बुरा-भला कहते हैं...ये बातें पहले के जमाने के हिसाब से सहीं भी थीं,लेकिन आज जब लडकियां भी लड़कों की बराबरी कर रहीं हैं...तो उन्होंने हर क्षेत्र में उनकी बराबरी करली है....अब हर समय लड़के ही ग़लत न होकर लडकियां भी ग़लत हो सकतीं हैं...वो ज़माना करीब-करीब जा ही चुका है,जब लड़कियों को लड़कों की गलतियों के लिए लड़कियों को सजा भोगनी पड़तीं थीं...अब कई बार लड़कियों की गलतियों की सजा लड़कों को भी भुगतनी पड़ जाती है....

लेकिन हम भी क्या करें ? लड़कियों पर दया दृष्टि रखने की आदत सी पड़ गई है.....कभी भी किसी मॉल में..या किसी भी ऐसी जगह जाओ जहाँ चेकिंग होती है..मैंने हमेशा लड़कियों की चेकिंग में ढील देते देखा है...डिटेक्टर से निकलने के बाद भी लड़कों की और चेकिंग होती है..लेकिन लड़कियों की नही...उनके बैग और पर्स भी सरसरी निगाहों से ही चेक किए जाते हैं....

कभी किसी लड़की की गाड़ी ख़राब हो तो कई मददगार आ जाते हैं...लेकिन लड़कों की ख़राब गाड़ी को देखकर कोई भूला-भटका ही मदद के लिए पहुँचता है...हमारे सामने कई ऐसे केस भी हैं जिसमे किसी लड़की ने लड़के का झूठा फायदा उठाया....हमारे देश में महिलाओं कि सुरक्षा के लिए बने कानूनों का भी कई बार ग़लत फायदा महिलाओं के द्वारा उठाया गया है....इन बातों का असर सभी महिला जाति पर पड़ता है...

मैं भी एक लड़की हूँ...मुझे लड़कियों से कोई दुश्मनी नही है...मुझे पता है की लडकियां हमेशा ग़लत नही है...लेकिन वो ही सही है ऐसा भी तो नही है न....मेरा यही कहना है..कि जिस वक्त जो सही हो उसका पक्ष लो...कोई भी निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों को समान मानो...चाहे वहाँ लड़का हो या लड़की...एक लड़की होते हुए भी कई स्थानों में पुरुषों के साथ होते भेदभाव के ख़िलाफ़ मैं कभी लिखूंगी.....सोचा ना था....

Sunday, June 28, 2009

टीम को हमारा साथ

२०-२० की हार के बादकाफ़ी दिनों के अंतराल में फ़िर से टीम इंडिया के खाते में एक नई जीत दर्ज हो गई,जिससे कुछ दिनों पहले तक उनकी घोर निंदा करने वाले भी फिर से उनकी तारीफों के पुल बंधने में लग गए हैं.....जिन्हें उन्होंने ही कुछ दिनों पहले २०-२० की हार के बाद गिराया था।

ऐसे में सोचने वाली बात ये है की क्या ऐसी तारीफों से खुश हुआ जाए या ऐसी निंदाओं से परेशान?जब कोई खिलाडी अच्छा प्रदर्शन करता है तो अगले दिन उसकी तारीफों से उसे सर्वोपरी करार दिया जाता है और अगले दिन यदि वो ही गेंदबाजी या बल्लेबाजी में चुक जाए तो उसे पहले दिन की गई उसकी तारीफ़ से भी ज्यादा बुराई उसे सुननी पड़ती है.हम ये क्यूँ नही समझते की वो भी इंसान ही हैं?बिना आराम के वो कई दिनों से खेलते रहते हैं,यहाँ तक की कई खिलाडी चोटिल भी होते हैं.

जब भी कभी हार का सामना करना पड़ता है,तब हमारी टीम को हमारे सहयोग की जरूरत ज्यादा होती है....और यही ऐसा समय होता है जब हम उन्हें बिल्कुल सहयोग नही करते.जीत में तो हर कोई साथ होता है सही प्रशंसक या फैन तो वही है,जो हार या जीत दोनों स्थिति में साथ दे।

जब २०-२० में टीम की हार हुई थी,तब मैंने एक न्यूज़ चैनल में ही देखा था....उन्होंने इस समाचार के लिए शीर्षक दिया था,"कट गई नाक".क्या ये सही है हमें यही सोचना है।

हमारी टीम को हमारे सपोर्ट की हमेशा जरूरत है,वैसे मुझे क्रिकेट देखने का उतना शौक नही है,लेकिन फिर भी मैं कभी उस बारे में लिखूंगी.....सोचा ना था....

Saturday, June 6, 2009

बारिश:दो नजरिये

कल शाम बारिश की पहली फुहार पड़ी...हवा के साथ ही मन भी शीतल हो गया.सभी अब गर्मी की तपिश से आज़ादी पाने के बारे में सोचने लगे.अब चारों ओर हरियाली दिखेगी.तेज़ बरसती बारिश से जुडा कोई न कोई किस्सा तो सभी के पास हैं,जो अब फिर से चाय-पकोडों के बीच सुनाये जायेंगे.माँ को फिर से बरसात देखकर अपने छाता भूल कर गए बच्चे की चिंता सताएगी.हर शाम घर में न सूखे हुए कपडों की भीड़ देखने मिलेगी.....हाँ भई, कहीं-कहीं बत्ती की आँख-मिचौली भी होगी.अब फ़िर से याद आएगा बारिश में आँगन में कपड़े उठाते हुए गलती से भीग कर जानबूझ कर भीगने का मौका पाना....सड़क पर बहते हुए पानी पर कागज़ की नाव बना कर छोड़ना....मेढकों का शोर और नागराज के दर्शन के लिए भी तैयार रहना होगा...धूल और पसीने से आज़ादी मिलेगी.....सावन के झूले,राखी का त्यौहार...मतलब भैया से मिलने मिलेगा.....भगवान्!ये बारिश का मौसम जल्दी क्यूँ नही आता?


कुछ चेहरों पर खुशियाँ तो कुछ पर ग़म भी है.घर के छप्पर की मरम्मत जल्दी करानी होगी....फ़िर से घर के सामान पानी से बचाने के लिए बर्तन लगाने होंगे...अब उल्टे-सीधे सोना होगा....किसी के सर पर पानी टपकेगा तो किसी के पैर पर....रातों की नींद अब छप्पर पर एक बूँद पानी पड़ते ही उड़ जायेगी.....जब-जब धूप निकलेगी सामान को सुखाने की जद्दोजहद शुरु हो जायेगी....निर्दयी बारिश इसे फिर से भिगाने की पूरी कोशिश करेगी....पानी के नल के पास की नाली नल के गड्ढे से मिल कर पीने के पानी की परेशानी बढाएगी......आए दिन घर पर सांप-बिच्छु से सामना करना पड़ेगा.....रोज़ का काम करने के लिए न जाने कितनी बार भीगना होगा और डॉक्टर की जेब भरेगी.....भीगी लकडियों से चूल्हा जलाना पड़ेगा....भगवान्!ये बारिश का मौसम इतनी जल्दी क्यूँ आता है?

ये बारिश हर एक के लिए अलग अहसास लेकर आती है....ऐसे और भी कई अहसास हैं जिनके बारे में....सोचा ना था....