Sunday, July 16, 2017

मैं लिखना चाहती हूँ



मैं लिखना चाहती हूँ
हर अहसास को,हर जज़्बात को
उम्मीदों को आशाओं को
ख्वाहिशों को,अरमानों को
धड़कन के हर रंग को
हर चाहत और उमंग को
बीती हुई हर बात को
अपनी हर सुबह हर रात को
हर अजनबी के अपनेपन को
और परिचितों के बदले रंग को
अपने हर स्वार्थ,लालच और बेईमानी को
अपनी हर नादानी को
हर हारे हुए पल को
अपने आज को और कल को
अपने हर अपमान को
जाने पहचाने से उस अनजान को
हामी में दबी न को
हर न में छुपी हाँ को
जो कही न कभी,उस बात को
हर राज़ और अंदाज़ को
ख़ामोशी के उस गीत को
मौन के संगीत को
बस लिखना चाहती हूँ
हर उस बात को जो कह न सकूंगी
शायद कभी..

एक ऐसी तुकबंदी जिसके विषय में कभी सोचा ना था....

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (17-07-2017) को "खुली किताब" (चर्चा अंक-2669) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाआआह.... बहुत खूब!

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  3. बहुत बढ़िया सुंदर एहसास को वयां करती

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