Friday, August 26, 2016

कृष्ण बनने की चाह

कृष्ण आज क्षमा माँगते हैं हर उस माँ से,जिसका बच्चा कृष्ण बनने की ठानकर घर से निकलता है..और बनना चाहता है सिर्फ़ माखनचोर..करना चाहता है रासलीला..हरना चाहता है गोपियों के वस्त्र..तोड़ना चाहता है राह चलती गोपियों की मटकियाँ..बनाना चाहता है हर राधा को अपनी..पर नहीं मोहना चाहता बाँसुरी की मीठी तान से..नहीं करना चाहता सबसे प्रेम से बातें..नहीं करना चाहता लोगों की रक्षा..नहीं उठाना चाहता गोवर्धन का भार,कुरीति को मिटाने के लिए..नहीं करना चाहता कंस का विनाश..नहीं करना चाहता अन्याय का विरोध..नहीं करना चाहता भरी सभा में स्त्री के मान की रक्षा..नहीं जानता वचन के लिए मुस्कुराकर सौ अपराध क्षमा करना किसी के..नहीं छोड़ना चाहता पकवान,प्रेम से परोसे सादे भोजन के लिए..नहीं होना चाहता सत्य के साथ..नहीं अपनाना चाहता गीताज्ञान..नहीं फूंकना चाहता पांचजन्य..नहीं स्वीकारना चाहता अपनी ग़लतियों को सर झुकाकर..नहीं लेना जानता किसी माँ के शाप को मुस्कुराकर..माँ तो फिर भी देवकी-यशोदा बन जाती है बिना जाने..पर क्या उसका बच्चा कृष्ण बन पाता है?

कल कृष्ण के जन्म पर ना जाने क्यों ये ख़्याल आया..पहले तो कभी ऐसा...सोचा ना था....

Saturday, July 30, 2016

काल्पनिकता का सच

इस फ़िल्म की कहानी काल्पनिक है..किसी भी पात्र का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से सम्बंध मात्र संयोग है..इस तरह के जो डिस्क्लेमर फ़िल्म की शुरुआत में आते हैं लोग उसे वैसे ही नज़र अन्दाज़ कर देते हैं जैसे फ़िल्म से पहले आने वाले धूम्रपान ना करने वाले विज्ञापन को..।लोग ना तो धूम्रपान करना छोड़ते हैं और ना ही फ़िल्मों में दिखायी काल्पनिक कहानी को सच करने की कोशिश करना।

अधिकांश लड़कियों को "हाइवे" में जिस तरह आलिया भट्ट किड्नैप हुई थी..वैसे ही किड्नैप होना है,क्योंकि उन्हें लगता है कि किड्नैपर रणदीप हुड्डा ही होगा,जो उन्हें देश भ्रमण करवाएगा...लड़कियों को कंगना रानावत की तरह अकेले हनीमून पर लंदन जाना है क्योंकि उन्हें लगता है कि वहाँ ढेर सारे दोस्त मिलेंगे और वो हिंदी फ़िल्मी गाना गाकर नाचेंगी तो सभी ख़ुश हो जाएँगे..."जब वी मेट" की करीना की तरह कई लड़कियाँ आम घोषणा करके 'ख़ुद को अपनी फ़ेवरेट' क़रार दे चुकी हैं..उन्हें भी लगता है कि वो अगर कभी परेशानी में पड़ भी गईं,तो कोई ना कोई शाहिद कपूर की तरह आकर उन्हें बचा लेगा और वो आख़िरी वक़्त तक ट्रेन छूटने की फ़ीलिंग समझ कर अपना जीवनसाथी बदलने की कोशिश कर सकती हैं।"हँसी तो फँसी" की परिणिती की तरह उनके लिए भी कोई अपनी शादी छोड़कर भागा आ जाएगा..उन्हें लगता है 'ये जवानी है दीवानी' की दीपिका की तरह वो भी किसी रणवीर को होली वाला गाना गाकर रोक सकती हैं।

ये तमाम बातें काल्पनिक नहीं हैं..अलग-अलग समय पर अलग-अलग लड़कियों के मुँह से सुन चुकी हूँ..'हाइवे' वाला कल फिर से सुनने मिला,तो एक साथ सब याद आ गया..दूसरे की काल्पनिकता को गले लगाकर घूमना बहुत आसान लगता है।आश्चर्य की बात ये है कोई भी मैरी कॉम या प्रियंका चोपड़ा की तरह नहीं बनना चाहता..शायद वो दोनों काल्पनिक नहीं हैं इसलिए उनसे रिलेट करना आसान नहीं..कल्पना की उड़ान में जो मज़ा है वो वास्तविकता में कहाँ।लेकिन अफ़सोस ज़िंदगी तीन घंटे की कोई काल्पनिक फ़िल्मी कहानी नहीं है।

काल्पनिकता की मखमली चादर कितनी ही अच्छी क्यों न लगे..सुकुन की नींद वास्तविकता की कठोर धरातल पर ही मिल सकती है..इस परम सच्चाई को बहुत पहले अपना लिया था..पर इसे यूँ लिखने के बारे में पहले कभी...सोचा ना था....

Sunday, July 3, 2016

जूठन

कुछ दिनों पहले रश्मि दी से कुछ किताबें पढने के लिए ले आई थी..उनमें ही एक किताब थी ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन..पता ही नहीं था क्या होगा उसमें..कैसी होगी..मैं किताबों के पहले पांच पन्ने से अनुमान लगाती हूँ कि ये कैसी होगी..शायद ये अच्छी आदत नहीं है..लेकिन जब पहले पांच पन्ने बिना रुके पढ़े जाएँ तो मुझे लगता है कि आगे बढ़ना चाहिए..वैसे एक बार पढने के लिए किताब उठाने के बाद मैंने शायद अब तक चार किताबें ही वापस रखी हैं..सब पढ़ी जाती हैं लेकिन जूठन पढते वक़्त कुछ अलग ही अनुभव हुआ...कब पांच पन्ने बीते पता ही नहीं चला...बीते इसलिए लिखा क्योंकि ऐसा लगा जैसे ये सब घटित हो रहा है..आत्मकथा अगर इमानदारी से लिखी जाए तो ऐसा ही अनुभव होता है शायद..और इस किताब में अगर कुछ मिलेगा तो सिर्फ़ इमानदारी और कुछ नहीं.

जूठन कहानी है ओमप्रकाश वाल्मीकि के जीवन की..एक दलित को किस हद तक समाज उनकी निम्नता का अहसास करवाता है ये बात हर पन्ने पर आप समझ सकते हैं..उस परिस्थिति से जूझते हुए आगे बढ़ना बहुत साहस का काम है..जहाँ जीने के लिए भी हर पल जद्दोजहद करनी पड़ती हो..हर पल अपमान और तिरस्कार मिलता हो..उसमें इसे अपनी नियति न मानकर आगे बढ़ने का हौसला रखना शायद दुनिया का सबसे कठिन काम होगा..लेकिन ऐसे माहौल में भी एक दलित बालक ने ये हौसला दिखाया और उसके पिता ने इसे अपनी ‘जाति’ सुधारने का एक अवसर देखकर साथ दिया उसका..स्कूल तक पहुँच जाना ही काफी नहीं था..वहां पढना भी कम मुश्किल भरा नहीं था..ज़रा सोचिये जब सारे अध्यापक और सहपाठी आपको नीची नज़रों से देखें और हर पल आपका मज़ाक उड़ायें..और आपको पढने की बजाय साफ़-सफाई के काम में लगा दिया जाए..तो क्या आप वहां फिर कभी जाना चाहेंगे..?..शायद नहीं..लेकिन उसे तो आगे बढ़ना था किसी भी हाल में इसलिए उसने ये सारे भेदभाव भी झेले लेकिन आगे बढ़ने की अपनी चाह में कमी न आने दी..

इसी तरह अपने जीवन के हर पहलू को बिना झिझके ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साझा किया है..यहाँ तक की आखिर वक़्त तक उनके सरनेम ‘वाल्मीकि’ की वजह से कितना कुछ झेलना और सहना पड़ा ये भी उन्होंने बताया है..कई-कई बार उन्हें ब्राह्मण समझ लिया जाता था लेकिन वो ये बात सामने आते ही अपनी जाति बताने में एक पल की भी देरी नहीं करते थे..ये जानते हुए कि ये बात सामने आते ही उनसे प्रेम से पेश आने वाला उसी वक़्त उनसे दूर हो जाएगा और एक अपरिचित सा व्यवहार करने लगेगा..उनके जीवन में ऐसी घटनाएँ कई बार हुई..लेकिन उन्होंने कभी खुद को छुपाने की कोशिश नहीं की...यहाँ तक की उनकी पत्नी तक उन्हें उनका सरनेम बदलने के लिए कहा करती थीं पर वो कभी इस बात के लिए ख़ुद को तैयार नहीं कर पाए..शायद इतना कुछ देखने के बाद उन्हें इस बात की परवाह ही नहीं रह गयी थी और उनका स्वाभिमान उन्हें रोकता था.

 “मेरे बाहर के ही नहीं,मेरे अपने भी इस सरनेम से परेशान होने लगे थे..मेरे पिताजी अपवाद थे..मेरी पत्नी चंदा मेरे सरनेम को कभी आत्मसात नहीं कर पाई..न इसे अपने नाम के साथ जोडती है..अपने नाम के साथ वो वंशगोत्र खैरवाल जोड़ना ज़्यादा पसंद करती है....दफ्तर में भी कई अधिकारी सहकर्मी तथा अधीनस्थ कर्मचारी इस सरनेम के कारण मेरा मूल्यांकन कम करके आंकते हैं..शुरू-शुरू में गुस्सा आता था..विरोध तो अब भी करता हूँ लेकिन अलग-अलग ढंग से..अब कुछ सहजता से लेता हूँ,क्योंकि ये एक सामाजिक रोग है जो मुझे झेलना पड़ रहा है..‘जाति’ ही जहाँ मान-सम्मान और योग्यता का आधार हो,सामाजिक श्रेष्ठता के लिए महत्वपूर्ण करक हो,वहां यह लड़ाई एक दिन में नहीं लड़ी जा सकती है..लगातार विरोध और संघर्ष की चेतना चाहिए जो मात्र बाह्य ही नहीं,आंतरिक परिवर्तनगामी भी हो,जो सामाजिक बदलाव को दिशा दे..”

जूठन समाज का एक कड़वा सच सामने लाता है...इस किताब में न जाने ऐसी ही कितनी घटनाओं का ज़िक्र है कि आपको पढ़ते हुए समाज के जाति-धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव से बेचैनी का अनुभव होगा..किसी भी तबके से आते हो आखिर इंसान तो इंसान ही है..शायद अब इस तरह का भेदभाव उतना नहीं होता होगा लेकिन फिर भी पूरी तरह से ख़त्म हो गया ये कहा नहीं जा सकता...क्यूंकि किसी न किसी रूप में ये असलियत हमारे-आपके सामने आ ही जाती है...मुझे तो नहीं लगता कि हममें से कोई भी ऐसा होगा जिसने इस भेदभाव को साक्षात् नहीं देखा होगा या इसका हिस्सा नहीं रहा होगा..आप किसी भी ओर हो सकते हैं..भेदभाव करने वाले की ओर या सहने वाले की ओर...भले ही आप इस भेदभाव से आहत हुए हों लेकिन अगर आपने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाई हो तो आप इसका हिस्सा ही कहलायेंगे..और इस तरह तो मैं भी खुद को इसका हिस्सा ही पाती हूँ..शर्मिंदगी है पर सच है.

हर किताब को पढ़ते हुए कुछ पंक्तियाँ,कुछ भाव बहुत अच्छे लगते हैं और जब किताब के बारे में कुछ लिखती हूँ तो उसे शामिल कर लेती हूँ लेकिन यहाँ तो हर घटना..हर शब्द इस तरह बीतते गए कि सबकुछ साथ है और लिखने के लिए कुछ भी नहीं..फिर भी एक पैराग्राफ को शामिल कर रही हूँ क्यूंकि लगता है ये बात इस आत्मकथा का सार है..

भारतीय समाज में ‘जाति’ एक महत्वपूर्ण घटक है..‘जाति’ पैदा होते ही व्यक्ति की नियति तय कर देती है..पैदा होना व्यक्ति के अधिकार में नहीं होता..यदि होता तो मैं भंगी के घर क्यों पैदा होता?जो स्वयं को इस देश की महान सांस्कृतिक धरोहर के तथाकथित अलमबरदार कहते हैं,क्या वे अपनी मर्ज़ी से उन घरों में पैदा हुए हैं? हाँ,इसे जस्टिफाई करने के लिए अनेक धर्मशास्त्रों का सहारा वे ज़रूर लेते हैं..वे धर्मशास्त्र जो समता,स्वतंत्रता की हिमायत नहीं करते,बल्कि सामंती प्रवृतियों को स्थापित करते हैं..”

इस आत्मकथा को पढ़ते हुए मुझे बार-बार महाभारत के कर्ण की याद आती रही..जब कर्ण के बारे में पढ़ा था तब भी इसी तरह के भाव मन में आया करते थे..एक समर्थ इंसान को उसकी जाति रोका करती थी..कुछ इसी तरह के भाव इस किताब के हर पन्ने को पढ़ते हुए भी आते रहे...हर पल ये सब झेलना पड़ा तो ओमप्रकाश वाल्मीकि को कई दोस्त ऐसे भी मिले जो जाति धर्म से परे दोस्ती निभा पाए..ऐसे लोगों के लिए मन श्रद्धा से भर उठता है.


ये कहानी दिल पर चोट करती एक मार्मिक कहानी है और किसी ने ये सब सच में झेला है जानकर बहुत दुःख होता है..जाने अब भी कितनों को ये सब झेलना पड़ता होगा..एक किताब मुझे इस तरह समाज की कड़वी सच्चाई से रूबरू करवाएगी..सोचा न था....    

Thursday, May 19, 2016

आवाज़ को सींचने-पोसने वाले वनमाली सर


ज़िन्दगी में सभी ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया है..लेकिन अगर मैं किसी की सबसे ज्यादा शुक्रगुज़ार हूँ तो वो हैं मुझे वॉइस् ट्रेनिंग देने वाले वनमाली सर..जब वहां गयी थी तो मुंह से शब्द नहीं निकलते थे..पर उन्होंने शब्दों में भाव लाना सिखाया...या कहूँ उन्होंने ही आत्मविश्वास दिलाया मुझे..जिसके कारण मैं लोगों के सामने बोलने लायक हो सकी..उनकी वॉइस् ट्रेनिंग का फायदा न सिर्फ मेरी आवाज़ में हुआ बल्कि मेरे व्यक्तित्व और मेरी ज़िन्दगी में भी हुआ...अपने उपनाम को सही साबित करते हुए वनमाली सर ने मेरे व्यक्तित्व को संजोया और सींचा भी...मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे वनमाली सर का सानिध्य मिला..एक सच्चे गुरु की तरह उनका सीखाना कभी पूरा नहीं होता था..और ना ही सीखना..हर वक़्त कुछ न कुछ सीखते ही रहते..उन्हें हिंदी नहीं आती थी पर वो कोशिश करते..हमेशा कहते कि तुम मुझसे हिंदी में बात करो...अगर न समझ आता तो मतलब पूछते..और हर कठिन शब्द को दोहराते..कभी कोई उनके सामने हिंदी की किसी बात पर कुछ कह दे जो उन्हें सही न लगे तो तुरंत मुझसे पूछते..सही है या नहीं...


हमेशा मुझे कहते तुम्हें अपनी हिंदी और सुधारनी चाहिए..मुझे ज्यादा से ज्यादा पढने के लिए प्रोत्साहित करते..एक बार अपना लिखा उनके सामने पढ़ा उस दिन से कभी भी किसी भी विषय पर लिखने के लिए कह देते..और जब उन्हें सुनाती तो हमेशा कहते तुम अच्छा लिखती हो...इस पर ध्यान दो..मेरे विविध भारती में काम करने की बात जब उन्हें बताई तो बहुत खुश थे..आखिरी बार जब उनसे मुलाक़ात हुई तो काफी देर तक मुझे सुनते रहे फिर उन्होंने कहा..तुम ऑल इंडिया रेडियो वालों जैसे ही बातें करने लगी हो..उनसे पूछी पर ये सही है या नहीं..तो उन्होंने कहा था..”कम से कम अब ठहराव आया तुम्हारे बोलने में”..ये उनकी हमेशा की आदत थी बिना विषय की बात करने देते थे अपने स्टूडेंट्स को और फिर एकाएक रोककर बताते कि पिच कैसी है..वॉल्यूम क्या रखना चाहिए..और किस बात पर ध्यान देना चाहिए जिससे और अच्छी आवाज़ होगी..हर पल उनका ध्यान सिर्फ हमें सिखाने में ही रहता.


ट्रेनिंग पूरी होने के पहले ही मैंने उनकी ऑफिस ज्वाइन कर ली थी..पर कभी ट्रेनिंग टाइम और ऑफिस का टाइम फिक्स नहीं होता था..जैसे ही कोई स्टूडेंट आये वो मुझे भी बुला लेते सीखने के लिए..भले ही ऑफिस का कोई बेहद ज़रूरी काम रुक जाए..एक बार की बात याद है उन्होंने पेपर में कहीं फैज़ अहमद फैज़ की ग़ज़ल का शेर देख लिया..बस पेपर कटिंग अगले दिन मेरे सामने थी और अगला काम उस ग़ज़ल को ढूँढना..नेट से पूरी ग़ज़ल निकली गयी..”मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग”...कई उर्दू अल्फाजों का अर्थ उस वक़्त नहीं बता पायी उन्हें...हम दोनों परेशान थे कि अब क्या किया जाए..उसी दिन रेडियो एनाउंसर मनोहर महाजन जी सर से मिलने आये उनसे सारे अर्थ पूछे गए...फिर अगला काम मुझे मिला उसे याद करना और सारे उर्दू के अल्फाजों का सही उच्चारण करना है...किसी तरह कई-कई बार सुनकर याद की थी वो ग़ज़ल..और जब सर को सुनाई तो उनके चेहरे पर संतुष्टि थी.


इसी तरह का मौका आया था जब धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध नाटक “अँधायुग” से गांधारी के शाप वाला हिस्सा हमें मिला..सर को वो हिस्सा पूरे भाव के साथ चाहिए था..आज भी याद है एक दिन में दस-दस..बारह-बारह बार उसे सुनाया करती थी पर उन्हें कभी पॉज सही नहीं लगते तो कभी भाव ठीक नहीं आते..इस तरह कोशिश करते-करते शायद पंद्रह-बीस दिन बीत गए..और मुझे किसी और पैसेज पढने की इजाज़त नहीं थी..एक दोपहर में सारे पॉज बदलकर सर के सामने बोली..तो उन्हें फिर भी पसंद नहीं आया..बोले थोड़ी देर में फिर करो...बहुत बुरा लगा उस दिन..ऐसा लगा मैं कभी आगे बढ़ पाउंगी या नहीं और ये सब सोचते हुए दुःख हुआ..इतनी बार बोल-बोलकर याद तो पूरा हो चूका था...पांच मिनट बाद फिर से बोलते समय सारे शब्द मुंह से यूँ निकलने लगे जैसे ये किसी कहानी का हिस्सा नहीं बल्कि मेरे अपने शब्द हैं...बोलते-बोलते कब रोने लगी पता नहीं चला..पर रुकी नहीं..और जब सब ख़त्म हुआ तो सर खुश थे..और मैं खुश होने की बजाय रोये चली जा रही थी आंसू रुक ही नहीं रहे थे...उस दिन के बाद से कोई भी सर से मिलने आये मुझे गांधारी वाला हिस्सा करके दिखाना होता था...इतनी बार किया कि वहां सब मुझे “गांधारी” कहते लगे थे .. एक दिन आँख का रूटीन टेस्ट करवाकर लौट रही थी तो उजाले के कारण आँखों पर रुमाल ढँक ली..पापाजी ने कहा ये ठीक है वैसे भी तू “गांधारी” है.


वनमाली सर हमेशा ज़िन्दगी का हिस्सा रहे हैं और रहेंगे...उनकी सिखाई हर बात याद है..साथ है..आज सुबह 88 साल की उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया..लेकिन मुझे दुःख नहीं हो रहा..उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का हर पल किसी न किसी को..कुछ न कुछ सिखाते हुए बिताया है..खुलकर ज़िन्दगी जी है..और हम जैसे जाने कितने पौधे रोपे हैं,जो दुनिया में उनका नाम रोशन कर रहे हैं और कुछ उनकी विद्या को आगे भी बढ़ा रहे हैं..ये सच है कि हम सीखाने में उनकी बराबरी कभी नहीं कर पायेंगे पर अगर दस प्रतिशत भी कर पायें तो भी बहुत है.



इस बात का यकीन है कि सर जहां भी रहेंगे आसपास वालों की पीच,वॉल्यूम और पॉज का ज्ञान ज़रूर बढ़ जाएगा..वो सिखाते रहे हैं और सिखाते रहेंगे..एक गुरु हमेशा साथ रहता है.. घर पहुँचते ही अचानक एक गहरी सांस छोड़ी..तो याद आया..यही तो हमारा पहला वॉइस्लेसन था..यादें बहुत हैं..बातें बहुत हैं..सब याद साथ रहेगी..आपकी हर बात साथ रहेगी..बस आज का ये दिन याद नहीं रखना..क्यूंकि ये दिन तो कभी सपने में भी...सोचा ना था....

Tuesday, May 17, 2016

भाषा की दुर्दशा

आज टीवी पर किसी कार्यक्रम का विज्ञापन आ रहा था हिंदी में...जहाँ वैज्ञानिक को वैग्यानिक लिखा था..वहीँ अदृश्यता को आद्रिश्यता लिखा था...ऐसी ग़लतियाँ अक्सर देखने मिलती है...न सिर्फ मनोरंजक चैनल्स में बल्कि न्यूज़ चैनल्स में भी..ये टाइपिंग की ग़लतियाँ तो नहीं हैं..ये हिंदी भाषा के ज्ञान की कमी है..इन दिनों हिंदी का स्तर गिरता जा रहा है..हैरत की बात तो ये हैं कि इस तरह की ग़लतियाँ जितनी टेलिविज़न और इन्टरनेट में देखने मिलती है उतनी ही प्रिंट मिडिया में भी देखने मिल रही है...अभी शायद महीने भर पहले की बात है एक हिंदी अखबार में पहले पन्ने पर चश्मे से सम्बंधित कोई खबर छपी थी..जहाँ शीर्षक में ही चश्मे की जगह चस्मा छपा था...वैसे तो पहला पन्ना हो या आखिरी ऐसी ग़लती नहीं होनी चाहिए..पर पहला पन्ना होने से हर एक की नज़र उस पर पड़ेगी..तो कम से कम हिंदी जानने वालों के बीच तो उस अखबार की साख गिर ही सकती है..


अगर कोई इस ग़लती को नज़र अंदाज़ कर भी दे तो उसी दिन मैं उसी अखबार में शब्द पहेली(वर्ग पहेली) भर रही थी,उसमें एक जगह औरत,स्त्री इन शब्दों का पर्याय भरना था तीन अक्षरों में..दूसरे शब्द के जवाब भरने के कारण आख़िरी अक्षर 'ला' आ चुका था,इसलिए 'महिला' शब्द भर दिया..पर उसके बाद आसपास के बाक़ी शब्द नहीं भरे गए..सूझ ही नहीं रहा था,'महिला' के अलावा और कौन-सा शब्द आ सकता है..जब अगले दिन जवाब देखा तो पाया वहाँ "अबला" शब्द लिखा है।बहुत आश्चर्य हुआ..स्त्री और औरत का पर्याय 'अबला' कैसे?..आख़िर कौन है ये इंसान जो शब्द पहेली(वर्ग पहेली) बनाता है पर उसे ख़ुद शब्दों के पर्याय नहीं मालूम..अगर 'अबला' ही लिखवाना था तो वहाँ 'कमज़ोर स्त्री' या सबला का विलोम जैसा विकल्प चुना जा सकता था।लगता है शब्द पहेली लिखने वाले/वाली को हिंदी की कम जानकारी थी.


कहते हैं जिस भाषा का ज्ञान बढ़ाना हो उस भाषा का अखबार पढना चाहिए..ऐसे में अखबार की भूमिका कितनी ज़रूरी होती है ये तो हम सभी जानते हैं...कम से कम हिंदी अखबारों में लिखने या प्रूफ रीडिंग जैसे कामों के लिए तो ऐसे लोगों को रखना चाहिए जिन्हें हिंदी का अच्छा ज्ञान हो..इतना भी हो जाए तो शायद कभी हम किसी को कह सकें की हिंदी सुधारने के लिए हिंदी अखबार पढ़ें...अभी तो इतनी ही उम्मीद करना बहुत है..शब्द पहेली की तो बात ही क्या करें..?..वो तो एक अलग ही मुद्दा है..शब्द पहेली को तो हल करने वाला ही..शायद अगले दिन उत्तर से जांच सकता है..और शब्द पहेली बनाने वाला/वाली तो खुद ही भाषा की पहेली में उलझा लगता है.


हिंदी हमारी मातृभाषा है..देश में मातृभाषा का वही हाल है जो घर-घर में माँ का है..यह एक कड़वा सच है पर अक्सर बच्चे माँ की फ़िक्र तभी करते हैं जब माँ बहुत बीमार हो जाती है..उससे पहले न माँ कभी बच्चों से अपनी तकलीफ बांटती है और न ही बच्चे ध्यान देते हैं...काश इस बार हम वक़्त पर ध्यान दे सकें.

कभी देश में अपनी प्यारी भाषा हिंदी की ये दुर्दशा देखने मिलेगी...सोचा ना था....


Sunday, May 15, 2016

काशी का अस्सी


आज पढने के लिए कुछ नई किताबें निकालते समय “काशी का अस्सी” पर नज़र पड़ी.पिछले साल इस किताब को पढ़ा था मैंने..पर इसके बारे में कुछ लिखा नहीं था..दरअसल इसे पढने के बाद समझ ही नहीं आया कि क्या लिखूं इसके बारे में...पर आज जब दुबारा ये नज़र आई तो लगा इसके बारे में कुछ तो लिखना ही चाहिए.

एक साल हो गया है काशीनाथ सिंह के लिखे इस उपन्यास को पढ़े हुए लेकिन न तो उस वक़्त ऐसा कुछ पढ़ा था और न ही आज तक ऐसा कुछ पढ़ा है..आमतौर पर उपन्यास में कहानी होती है..लेकिन इस उपन्यास में कहानी होते हुए भी कहानी नहीं है.ऐसा लगता है जैसे इसके ज़रिये लेखक हमें काशी के अस्सी घाट की सैर कराने ले जाते हैं.काशी के अस्सी घाट का वर्णन करते हुए काशीनाथ सिंह लिखते हैं:


“शास्त्रों का मत है कि काल दुनिया का चक्कर मारकर यहीं विश्राम करता है – भांग-बूटी छानकर .बल्कि यूँ कहिये कि वो अपने नौकरों-चाकरों को चक्कर मरने के लिए छोड़ देता है और खुद लेटा रहता है घाट की किसी पटिया या चौतरे पर,इसलिए जहाँ दुसरे नगरों को “राम’ का नाम लेने के लिए फुर्सत निकालनी पड़ती है वहीँ अस्सी वालों को “काम” के लिए फुर्सत का समय देखना पड़ता है.. “राम” के लिए तो फुर्सत ही फुर्सत है.”


काशीनाथ सिंह आपको इस उपन्यास के ज़रिये मोहल्ला अस्सी में ले जाते हैं और इतनी अच्छी तरह से की आपको पढ़ते हुए लगेगा जैसे आप वहीँ है बल्कि ऐसा लगता है जैसे ये सारे पात्र आपके इर्दगिर्द मौजूद हैं और आप हर उस घटना को अपनी आँखों से देख रहे हैं.

“जेल से अच्छी जगह तो दुनिया में कोई नहीं..देखिये तो इतिहास के सारे बड़े-बड़े काम वहीँ हुए हैं..कृष्ण तो पैदा ही वहीँ हुए,गांधी,नेहरु,लोहिया,जयप्रकाश,मंडेला-सबने वहीँ सीखा,लिखा-पढ़ा,काम किया,नाम किया..मुझ में भी वहीँ चेज आया”


हर पात्र इतने अपने लगते हैं जैसे आप बरसों से उनसे मिलते रहे हों..और इस तरह पात्रों से जुड़ने का कारण है उपन्यास की भाषा,जो स्थानीय बोली को ध्यान में रखकर चुनी गयी है.

“सूरज सबेरे-सबेरे बन-ठनकर लाल-पीले रंगों में घर से निकलता है,सफ़ेद झक आसमान की छोटी पर पहुंचता है और शाम ढलते-ढलते गिर पड़ता है –इसी पप्पू की दुकान में,इसी काठ की मेज़ पर,इसी शीशे के गिलास में....चलता है गोला बनकर,गिरता है गोली बनकर-भांग की हरी गोली”


 हर घटना का बेहतरीन चित्रण..जो आपको उपन्यास की पृष्ठभूमि से जोड़ता है.काशीनाथ सिंह की लेखन शैली इतनी रोचक और धाराप्रवाह है कि एक बार पढने बैठो तो पूरा पढ़े बिना उठा ही नहीं जाता..(मुझे एक दो बार उठना पड़ा पर बहुत मन मार के)कभी-कभी ही ऐसा कुछ पढने में आता है.
एक साल बीतने के बाद भी इस उपन्यास की यादें ऐसी हैं जैसे हाल ही में पढ़ा हो..ऐसा सभी किताबों के साथ नहीं होता..कई बार एक-दो पृष्ठ पलटने पड़ जाते हैं और याद ताज़ा हो जाती है..पर आज तो काशी का अस्सी देखते ही मानो फिर अस्सी घाट की सैर हो गयी..वैसे कभी गयी नहीं हूँ अस्सी घाट..लेकिन लगता है वो बिलकुल ऐसा ही होगा..



किताबों से काल्पनिक दुनिया की सैर तो बहुत की है पर किताब  कभी दुनिया की किसी जगह की सैर किताबों के ज़रिये होगी..सोचा ना था....

Monday, May 2, 2016

पढ़े-लिखे अनपढ़

कल एक परिचित मोबाइल में अपनी कामवाली का मैसेज दिखा रहीं थीं,जो इंग्लिश में था..मैंने कहा "मोबाइल में ऐसी सेटिंग होती है जब फ़ोन ना लगने पर मेसेज अपने आप चला जाता है या हो सकता है आपकी कामवाली पढ़ी-लिखी हो।" 

ये बात उन्हें जले पर नमक जैसी लगीवो बिफरकर बोलीं-नहीं..कोई पढ़ी-लिखी नहीं हैं..कब से जानती हूँ उसको..पहले तो ठीक थी अब इंग्लिश बोलती रहती है,काम में कहाँ दिमाग़ लगता है..घर में जो बात होती है कान लगा रहता है..उसका पति बीमार हो गया तो बोलती है CT स्कैन करवाना है..एक हफ़्ते की छुट्टी चाहिए बेटे को रिज़ॉर्ट घुमाने ले जाना है..बताओ आजकल इनको सब पता है..दिनभर whatsapp चलाती है..उनकी शिकायती लिस्ट बढ़ी जा रही थी।

मुझे ये समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें उसके इंग्लिश में बात करने,whatsapp चलाने,बीमार पति के CT स्कैन करवाने या बेटे को रिज़ॉर्ट ले जाने से परेशानी क्या थी?..उसकी ज़िंदगी वो चाहे जैसे जिए..अपनी मेहनत की कमाई चाहे जैसे ख़र्च करे।हो सकता है उनकी काम वाली ज़्यादा पढ़ी लिखी ना हो..पर उसके बारे में सुनकर ही मुझे लगा कि वो आसपास के लोगों से ज़रूर कुछ ना कुछ सीखने की कोशिश करती होगी..और शायद सीख भी रही है..लेकिन उसकी इस आदत से मालकिन ख़ासी परेशान है।

मालकिन को शायद कामवाली ख़ुद से ज़्यादा आगे बढ़ती नज़र आ रही है..पर इसमें दोष किसका है..मालकिन ख़ुद हाउस वाइफ़ बनने का ढोंग करती है,लेकिन अपने घर की कोई सुध नहीं..हाँ..हर सीरियल वाले घर की ख़बर ज़रूर है।कामवाली से महँगा स्मार्ट फ़ोन है उसके पास..पर चलाना नहीं आता..पता नहीं मालकिन को ये सच्चाई स्वीकारने में कितना वक़्त लगेगा की उसकी कामवाली वर्किंग वुमन है,पर इज़्ज़त उसकी उतनी नहीं होती..वो रोज़ तरह-तरह के लोगों से मिलती है और उनसे कुछ सीखती है तभी तो आज स्मार्ट फ़ोन भी संभालती है और कई लोगों के घर भी.

इस मालकिन की तरह के लोग दूसरों को पीछे रखने की चाह में ख़ुद आगे बढ़ना भूल जाते हैं..इन्हें साधन और वक़्त की कमी नहीं है पर आगे बढ़ने की चाह ही नहीं है..ख़ुद को तराशना ही नहीं चाहते..पढ़े-लिखे हैं पर सिर्फ़ इसलिए क्यूँकि किसी ने कह दिया पढ़ना ज़रूरी है..किसी ने ये नहीं कहा कि हर वक़्त बढ़ना भी ज़रूरी है..इसलिए नहीं बढ़ रहे..वहीं रुके हैं..आसपास के लोग इन्हें पीछे छोड़ आगे बढ़ रहे हैं तो पसंद नहीं आ रहा,चाहते हैं वो भी न बढ़ें।

आगे बढ़ने के लिए सिर्फ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए..जैसे ये कामवाली ख़ुद को आगे बढ़ा रही है..अगर आपको आगे बढ़ना है,तो भूल जाइए आप किस तबके से आते हैं..आपकी क्या मजबूरियां हैं..याद रखिए तो बस अपनी मंज़िल और अपना सपना।यकीन मानिए अगर आपमें सीखने की चाह है तो कोई आपको रोक नहीं सकता...छोटी मगर गहरी बात समझना कुछ लोगों के लिए इतना मुश्किल होगा...सोचा ना था....