Saturday, August 30, 2014

अब बस

आज बस वाले ने बीच रोड बस रोक दी,क्यूँकि एक आदमी नियम तोड़कर सामने वाले दरवाजे़ से चढ़ा था..और वो आदमी बजाय नीचे उतरकर पिछले दरवाजे़ से चढ़ने के बेशर्मों की तरह बैठा रहा और खु़द को सही साबित करता रहा..कुछ देर में कंडक्टर और कुछ यात्री ड्राइवर को ही समझाने लगे..उसने बस ये कहा- "अगर पब्लिक को परेशानी है,तो उस आदमी को कोई कुछ क्यों नही कहता?"

बस तो चल पड़ी..पर वो सवाल अब भी वहीं खड़ा है..क्यों सबने उस व्यक्ति को समझाया जो सही था..शायद पूरी बस के ग़लत लोगों ने उस एक सही इंसान को ही बदलना सही समझा.. मुझे आज पहली बार खु़द पर शर्मिंदगीं महसूस हुई कि मैंने ग़लत का विरोध नहीं किया;सारे जवाब..सारे तर्क मेरे मन में बार-बार चल रहे थे..पता नहीं क्यों मैनें ख़ुद को कुछ भी कहने से रोक लिया,जबकि मैं उसे उसकी ग़लती बताना चाहती थी..उस ड्राइवर का साथ देना चाहती थी,ये प्रण तो मैनें कर लिया था कि चाहे कितनी भी देर हो मुझे इस बस से ही घर जाना है..पर काश मेरा ये साथ मूक न होता ।

नियम को ताक पर रखकर मनमानी करना हमें आम लगने लगा है; एक छोटी-सी घटना का मुझ पर इतना गहरा असर होगा..सोचा न था...

3 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 01/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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    1. धन्यवाद कुलदीप जी

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  2. होते हैं ऐसे लोग जो खुद के अलावा किसी और को सही मानते ही नहीं हैं , सिरफिरे कहीं के

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